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Tuesday, August 21, 2012

जीवन का बदलता रंग



मकान जैसे 
परिवार की दीवारों का
चमकता,दमकता
सब से खूबसूरत रंग
होता था
समय के अंतराल में
नए नए कमरे बनते गए 
दिन पर दिन
मेरा रंग फीका
पड़ता गया
अपनी आभा खोता गया
रिश्तों से विश्वास
पपड़ी सा खिरता गया
अब बस इंतज़ार है
कब दीवारों का रंग
बदल दिया जाएगा
चमकता हुआ
नया रंग चढ़ा जाएगा
   नए रंग के सामने
फीका पड़ता जाऊंगा
समय के साथ
नेपथ्य में छुप जाऊंगा
21-08-2012
670-30-08-12


Saturday, June 2, 2012

उजड़ गयी जब फसल सारी



उजड़ गयी
जब फसल सारी
तुम पूछते
खलिहान कहाँ है
बिखर चुका
जब परिवार सारा
तुम पूछते घर कहाँ है
खुद गए
रास्ते में गडडे
अब पूछते हो
रास्ता कहाँ हैं
कैसे बताऊँ
खुद ने ही मारी थी
कुल्हाड़ी
अपने पैरों पर
चढ़ाया था
सब को सर पर
समझाया था
कोई बड़ा नहीं
कोई छोटा नहीं
सब बराबर घर में
02-06-2012
556-76-05-12

घर की खामोशी



घर की खामोशी
हर पल दिल को
चीरने लगी
आपस में कलह
साफ़
दिखने लगी
सुबह को ही शाम
होने लगी
एक दूसरे पर ऊंगली
उठने लगी
प्रेम पर नफरत
हावी होने लगी
अहम् की जीत
हो गयी
अहम् ने
सत्ता हाथ में ले ली
परिवार के बिखरने की
रिश्तों के टूटने की 
शुरुआत हो गयी
02-06-2012
554-74-05-12

Tuesday, April 17, 2012

एक एक ईंट जोड़ कर बनाया था जो मकान मैंने


एक एक ईंट जोड़ कर
बनाया था जो मकान मैंने
बिना अपनों के
अब मुझे ही काटने को
दौड़ता है
जिसमें देखा था एक
सुखी परिवार के साथ
रहने का सपना
अब एक कैदखाने
सा लगता है
उसके बगीचे के फूलों में
महक नहीं  है 
तितलियाँ घर में
झांकती तक नहीं हैं 
वीरान जंगल में स्थित
उस मंदिर की तरह
जिसमें सब कुछ है
पर पूजने के लिए
कोई मूरत नहीं है
जहां दर्शन के लिए
कोई नहीं झांकता ,
है तो केवल
मेरे जैसा ही एक पुजारी
जो आशा से सामने
सड़क को देखता रहता
कभी कोई आयेगा
मंदिर में मूरत सजाएगा
दर्शानार्थी आने लगेंगे
घंटे बजने लगेंगे
फूल चढ़ने लगेंगे
पूरा मंदिर महकने लगेगा
परमात्मा का
बसेरा दिखेगा
ठीक उसी तरह मैं भी
आशा में जीवित हूँ
कभी मेरा भी घर बसेगा
परिवार बढेगा
बच्चों की किलकारियों से
घर गूंजेगा
बगीचे के फूलों पर
तितलियाँ मंडरायेंगी
मुझे लगेगा ईंटों में
जब तक ऐसा नहीं होता
मकान किसी वीरान
कैदखाने से
कम नहीं लगेगा
17-04-2012
453-34-04-12


Thursday, April 12, 2012

यादगार बन गया दिन सात अप्रैल का



यादगार बन गया
दिन सात अप्रैल का
कोई आया
बोस्टन,न्यू जर्सी से
तो कोई मुंबई,बंगलौर से
क्या पुत्र पुत्री
क्या साले,साली
क्या पोते नाती
सब के सब इकट्ठा हुए
अजमेर शरीफ में
माँ पिता के विवाह की
चौहतरवीं वर्षगाँठ पर
मिला परिवार पूरा
आये मित्र,रिश्तेदार भी सारे
सुनाये सबने किस्से
उनके साथ बिताये दिनों के
हो गए भाव विव्हल
याद कर
खट्टी मीठी बातों को
माँ ने नृत्य किया
पिता ने बताये सफल
वैवाहिक जीवन के राज़
खूब हँसे खूब नाचे गाये
इस सुनहरे अवसर पर
बिरले ही होते हैं
जिन्हें होते नसीब
जीवन में ऐसे अवसर
11-04-2012
432-12-04-12