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Sunday, June 26, 2011

कितने बेदर्द होते ये रूठ कर जाने वाले

कभी 
नाज़ उठाते थे
सर पर बिठाते थे
अब मौक़ा
दिल दुखाने का
ढूंढते
निरंतर परदे के
पीछे से वार करते
कितने बेदर्द होते
ये रूठ 
कर जाने वाले
पहले दिल लगाते
फिर बड़े शौक से
क़त्ल करते
मोहब्बत के नाम को 
बदनाम करते
26-06-2011
1101-128-06-11

Monday, April 4, 2011

वो निरंतर मुखालते में रहते थे

बड़े अरमानों से
खटखटाया
दरवाज़ा उनके घर का
दरवाज़ा खुला ,
वो सामने खड़े थे
बड़ी बेदर्दी से
ठोकर मार कर 
निकाला हमें
ये भी ना पूछा
क्यूं आये 
हम उनके घर पे ?
वो निरंतर मुखालते में
रहते थे
सब को एक नज़र से
देखते थे
हम न्योता हमारी शादी का
देने गए थे
उन्होंने समझा प्यार का
 इज़हार करने आये हैं
04-04-2011
598—31 -04-11