कभी
नाज़ उठाते थे
सर पर बिठाते थे
अब मौक़ा
दिल दुखाने का
ढूंढते
निरंतर परदे के
पीछे से वार करते
कितने बेदर्द होते
ये रूठ
कर जाने वाले
पहले दिल लगाते
फिर बड़े शौक से
क़त्ल करते
मोहब्बत के नाम को
बदनाम करते
26-06-2011
1101-128-06-11
निरंतर कुछ सोचता रहे,कुछ करता रहे,कलम के जरिए बात अपने कहता रहे.... (सर्वाधिकार सुरक्षित) ,किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाने का कोई प्रयोजन नहीं है,फिर भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे तो क्षमा प्रार्थी हूँ )