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Sunday, August 26, 2012

कभी हँसी भी दे दे मुझे



या खुदा जी भर कर के
सज़ा दे दे मुझे
बस इतनी सी इल्तजा तुमसे 
जितनी भी सज़ा देनी है
एक बार ही दे दे मुझे
यूँ तिल तिल कर ना
मार मुझे
हर लम्हा ना रुला मुझे
कभी जीने का मौक़ा
भी दे दे मुझे
रुआंसे चेहरे पर कभी
हँसी भी दे दे मुझे
26-08-2012
700-60-08-12

Monday, August 13, 2012

गुनाह की सज़ा



बहुत अरसे के बाद
उनका ख़त आया
हमने समझा उनका
घमंड चूर हो गया
नफरत छोड़
अब क्यूं उन्हें
मोहब्बत का ख्याल आया?
ख़त खोला तो उसमें
लिखा था
हमारा हर ख़त ज़ला कर
राख कर देना
साथ बिताया हर लम्हा
भूल जाना
जुबां से हमारा नाम तक
ना लेना
तुम पर शक कर
हमने जो गुनाह किया
उसकी सज़ा खुद को दे रहे हैं
साथ में उनके भाई का
ख़त भी था
जिसमें लिखा था
ख़त खुदकशी के बाद
बहन की
लाश के पास मिला था
13-08-2012
658-18-08-12