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Saturday, August 13, 2011

हर शख्श में डूबा हुआ

हर शख्श

व्यथा में डूबा हुआ
आँखों से आंसू

रोक नहीं पा रहा

परमात्मा से पूँछ रहा था
इंद्र किस जुर्म की

सज़ा दे रहा

धरती को सूखा रख रहा

पानी की एक बूँद

नहीं बरसा रहा

हर चेहरे पर

चिंता की लकीरें
हर पेट भूख के

डर से घबरा रहा
निरंतर

असमंसज में पडा हुआ
मंदिर से मस्जिद तक

दुआ कर रहा
आशा और विश्वाश

की परीक्षा ले रहा
जीने के लिए झूझ रहा

13-08-2011

1354-76-08-11

Sunday, June 5, 2011

इंसान के हाथ में लालच की कुल्हाड़ी थी

जंगल में घबराहट थी
इंसान के हाथ में
लालच की  कुल्हाड़ी थी
कुल्हाड़ी की सत्ता थी
धन लालच के चक्कर में
बेरहमी से चल रही थी
सबसे बड़ा पेड़ घबरा गया
बाकी पेड़ों से कहने लगा
पहला वार मुझ पर होगा
तुम्हारा नंबर बाद में
 आयेगा
हिम्मत ना हारना
जो किस्मत में लिखा
सहना होगा
अब इंसान भ्रष्ट हो गया
माँ बाप को भी नहीं
छोड़ता
पेड़ों को क्या छोड़ेगा
निरंतर
शोषण पेड़ों का किया
पानी को व्यर्थ बहाया
अब धरती को भी नहीं
छोड़ेगा
लालच में भूल गया
बिना पेड़ पानी के कैसे
जियेगा ? 
05-06-2011
1001-28-06-11
(५ जून विश्व पर्यायवरण दिवस पर) 

Wednesday, May 11, 2011

मौत के क्रंदन के बाद,हंसने का अवसर मिला

गरज
गरज कर बरसे बादल
पानी की बौछार करी
धूप को चीरा बूंदों ने
इन्द्रधनुष की छटा बिखेरी
वृक्षों को नहलाया जम कर
प्यासी धरती की प्यास
बुझाई
बालक, बूढ़े वर्षा में
नहाए
किसानों के चेहरे खिले
बीज खेतों में रोपेंगे
फसल नयी लगायेंगे
भूखे पेट आशा से भरे
नदी,तालाब जीवित हुए
निरंतर उदास चेहरे
खुशी से मतवाले हुए
हवा के ठन्डे झोंके चले
मोर नृत्य में मस्त हुए
पक्षी कलरव करने लगे
प्रतीत हो रहा मानो
मरघट फूलों से महका
मौत के क्रंदन के बाद
हंसने का अवसर मिला
11-05-2011
835-42-05-11

Monday, March 28, 2011

बुलबुला


मैं
बुलबुला पानी का
हवा से भरा
पानी से जन्मा
जब तक वजूद मेरा
अठखेलियाँ करता
निरंतर
साथ पानी के बहता
लहरों के साथ मचलता
जिस दिन फूट जाऊंगा
याद किसी को ना
आऊँगा  

पानी में मिल जाऊंगा
पानी बन बह
जाऊंगा
 28-03-03
534—204-03-11