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Friday, March 16, 2012

अपनी महफ़िल से मत निकालों मुझे

अपनी महफ़िल से
मत निकालो मुझे
बड़ी मुश्किल से
सहारा मिला था मुझे
अरसे बाद हँसना हुआ था
चैन की नींद सोया था
क्यों रातों में फिर से
जगाना चाहते
हँसते हुए को रुलाना
चाहते
खानाबदोशों सा
जिलाना चाहते
ना चाहो तो
मोहब्बत ना करो हमसे
दिल पर पत्थर रख लो
अपनी महफ़िल में
रहने दो मुझे
अपनी महफ़िल से
मत निकालों मुझे
16-03-2012
386-120-03-12

Sunday, April 3, 2011

इशारे से बुलाया था

इशारे से बुलाया था
मुस्कान से लुभाया था
कानों में
कुछ बुदबुदाया था
हमने
इश्क का आगाज़ समझा
हम ख़्वाबों में खो गए
वो नज़रों से ओझल
हो गए
खुद महफ़िल से चले गए
साज़ दिल का छेड़ गए
बजने से पहले ही
तोड़ गए
ज़िन्दगी निरंतर,ग़मों से
भर गए
03-04--11
590—23 -04-11

Friday, April 1, 2011

महफ़िल संगीत की सजी थी



महफ़िल
संगीत की सजी थी
मीठी आवाज़ में गायक
सुरों की सरिता बहा
रहा था
साजिन्दे सुर में साज़
बजा रहे थे
निरंतर सुर में सुर
मिला रहे थे
तभी तार सितार का
टूट गया
सुर बेसुरा हुआ  
ध्यान गायक का भंग
हुआ
क्रोध में तिलमिलाया
साजिन्दे को घूर कर
देखा
गालियों से उसे नवाज़ा
जुबान से दिल का
हाल पता चला
चेहरे से नकाब उतर
गया 

01-04--11
568—01-04-11