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Sunday, July 29, 2012

नयी नवेली दुल्हन थी


प्रियतम तडके घर से
काम पर निकल गए
बिना प्रियतम दिन
कैसे कटेगा  ?
रात सुहानी थी
दिन कैसा होगा ?
कब लौटेंगे प्रियतम ?
सोच में डूबी थी
अनमने भाव से काम में
लगी थी
प्रियतम के बिना
मन उदास था
समय काटे नहीं कट
रहा था
सब बोझ लग रहा था,
बिना प्रियतम बिन पानी के
मछली सी तड़प रही थी
उसका संसार अब 
प्रियतम में
सिमट गया था
वही लक्ष्य ,वही सपना
वही अब जीवन उसका
नयी नवेली दुल्हन थी
विवाह के बाद की दूसरी
सुबह थी
29-07-2012
627-24-07-12

Tuesday, May 15, 2012

मत पूछो इस बार का सावन कैसा होगा ?

मत पूछो इस बार
का सावन कैसा होगा ?
बिना महक के
फूलों का होगा
ना कोयल कूंकेगी
ना पपीहा बोलेगा
कोई भंवरा गुंजन
ना करेगा
प्रेमी युगल झूला
ना झूलेगा
कोई सावन गीत
ना गायेगा
कोई बादल खुल कर
ना बरसेगा
ना मन झूमेगा
ना ह्रदय
प्रेम हिलोरें लेगा
सावन में भी दिल
मायूस होगा
बिन उनके सब
सूना होगा
मत पूछो इस बार
का सावन कैसा होगा ?
15-05-2012
526-46-05-12

Sunday, May 6, 2012

कैसे कहूँ कभी हम उनके थे


कैसे कहूँ
कभी हम उनके थे?
हम सफ़र हम निवाले थे
उनके प्यार में मदहोश थे
समझते थे
चिपके रहेंगे ताजिंदगी
उनके दिल से
होश में आये तब तक
वो मिला चुके थे दिल
हमारे रकीब से
उतार दिया
हमें दिल से वैसे ही
जैसे उतारते थे 
माथे से बिंदी
नयी बिंदी लगाने के लिए
कैसे कहूं हम कभी
उनके थे
04-05-2012
497-12-05-12

Friday, May 4, 2012

प्रेम का समुद्र


पानी की बूँद था,
अपने प्रेम से
तुमने उसे समुद्र
बनाया
अब तुम ही विछोह
चाहती हो
भाप जैसे उड़ा कर
आकाश में
मिलाना चाहती हो
मेरे अस्तित्व को ही
मिटाना चाहती हो
सृजक भी तुम
विध्वंसक भी तुम
यह कैसे हो सकता है ?
कितना भी प्रयत्न कर लो
सफल नहीं हो पाओगी
अब भावनाओं से
खेल नहीं सकती
अपने प्रेम को नफरत में
बदल नहीं पाओगी
इस तरह मिटा नहीं
पाओगी
मैं वर्षा के साथ पुनः
बूँद बन कर धरती पर
आ जाऊंगा
अपने प्रेम से तुम्हें
सरोबार कर दूंगा
तुम मजबूर हो कर
फिर मुझे समुद्र
बनाओगी
सदा के लिए मुझ में
समा जाओगी
तुम्हारा अस्तित्व
मुझ में समाहित होगा
चाहोगी तो भी मुझसे
अलग नहीं हो पाओगी
04-05-2012
494-09-05-12

Monday, November 21, 2011

मैंने भी सपना देखा था,कोई मुझे भी मिल जाए


मैंने भी
सपना देखा था
कोई मुझे भी मिल जाए 
अपना जिसे कह सकूँ 
साथ हँसू ,साथ घूमूँ
हाथ में हाथ डाल के
छोटा सा संसार हो मेरा
स्वछन्द जिसमें रह सकूँ
खुशी से जी सकूँ
प्यार की निशानी को
जन्म दूं
घर का आँगन जिसकी
किलकारियों से गूंजे
साथ भी मिला,घर भी मिला
पर सफ़र अधूरा रह गया
काल के क्रूर हाथों से
खुशियों का संसार देखा
ना गया
मेरा देवता मुझसे
छीन लिया
जीवन शून्य हो गया
निरंतर आंसू बहाने के लिए
यादों के सहारे छोड़ दिया
कैसे सहूँ
विछोह प्रियतम का
समझ नहीं पाती हूँ
कसम खाती हूँ
अब ना देखूंगी सपना कभी
हर अबला से कहूंगी
सपनों पर विश्वास ना करे
टूटते हैं तो मौत से कम
नहीं होते सपने
मैंने भी सपना देखा था
कोई मुझे भी मिल जाए
अपना जिसे कह सकूँ .....

21-11-2011
1806-77-11-11