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Thursday, April 4, 2013

नदी के दो किनारे



हमारे सम्बन्ध
नदी के दो किनारों
जैसे हो गए  हैं
किनारे मिल भी नहीं सकते 
संबंधों का बहता पानी
दोनों किनारों को
सामान रूप से छूता है
इस कारण
अलग भी नहीं हो सकते
अगर यही मनोस्थिति रही
स्वार्थ और घ्रणा से पानी
इस हद तक दूषित हो जाएगा
एक दिन दोनों किनारे
टूट जायेंगे
हमारे सम्बन्ध भी
कभी ना बनने के लिए
नदी के पानी की तरह
बिखर जायेंगे
ऐसा हो उससे पहले आओ
एक कदम मैं बढाता हूँ
एक कदम तुम बढ़ाओ
अहम् को
मन से निकाल फैंको
बहते पानी को
रिश्तों का पुल समझ कर 

दोनों किनारों को मिला दो
08-64-04-02-2013
रिश्ते,सम्बन्ध,किनारे,नदी के किनारे ,जीवन
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Monday, April 1, 2013

आओ अब कुछ नया किया जाए



आओ अब कुछ
नया किया जाए
लीक से हट कर
चला जाए
रिश्तों को
निभाया जाए
अपनों को अपना
बना कर रखा जाए
परायों को
अपना बनाया जाए
जीवन को
सुखद बनाया जाए
आओ अब कुछ
नया किया जाए
01-57-01-02-2013
रिश्ते,जीवन,सम्बन्ध ,अपने.पराये
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   

Tuesday, March 19, 2013

कोई सुहाए ना सुहाए


चाहो तो
ह्रदय से पूछ लो
चाहो तो मन से पूछ लो
कौन सुहाता 
कौन नहीं सुहाता
कोई सुहाए ना सुहाए
चाहे मजबूरी कह दो
चाहे लाज शर्म से कह दो
रिश्ता तो फिर भी
निभाना पड़ता
जब निभाना ही है
क्यों ना हँस कर निभाओ
तनाव मुक्त रहो
स्वयं भी खुश रहो
दूसरों को भी खुश रखो
37-37-18-01-2013
रिश्ते,सम्बन्ध ,तनाव,जीवन
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Monday, March 18, 2013

अगर मैं तुम्हें समझना चाहूँ



अगर मैं
तुम्हें समझना चाहूँ
तो मुझे भी
तुम्हारे जैसे सोचना होगा
तुम मुझे समझना चाहो तो
तुम्हें भी
मेरे जैसे ही सोचना होगा
पर यह आसान नहीं होगा
हमें
अहम् को छोड़ना होगा
एक दूसरे की स्थिति,
परिस्थिति का ध्यान
रखना होगा
स्वयं को दूसरे के स्थान पर
रख कर सोचना होगा
तभी हम एक दूसरे को
समझ पायेंगे
नहीं तो स्वयं को सही
दूसरे को गलत कहते रहेंगे
35-35-18-01-2013
सम्बन्ध,रिश्ते,समझना ,अहम्
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Saturday, December 15, 2012

मन रोता सत्य देखने को आज



मन रोता
सत्य देखने को आज
चारों ओर
झूठे बड़बोलों का राज
छा रहा हर मन में
घनघोर अन्धेरा आज
ह्रदय तड़पता
प्रेम की आस में आज
अहम् इर्ष्या का नंगा
नाच हो रहा
इंसान इंसान का
दुश्मन हो गया आज
संबंधों में पड़ गयी दरार
भाई भाई की ले रहा जान
दोस्त बन गया
सबसे बड़ा दुश्मन आज
स्वार्थी हो गया संसार
साज़ बाज़ रहे
बिना सुर के आज
कैसा आया
यह काल प्रभु आज
कैसा आया
यह काल प्रभु आज
950-69-15-12-2012
जीवन,मन,सत्य,सम्बन्ध,अहम्,स्वार्थ,इर्ष्या,द्वेष, अहम्  

Tuesday, July 31, 2012

पता चल जाता था क्या पकाया ?,क्या खाया उन्होंने ?



पता चल जाता था
क्या पकाया ?
क्या खाया उन्होंने ?
कहाँ गए थे?
कौन आया था घर उनके
कौन खुश हुआ?
कौन नाराज़ उनसे?
सुबह से शाम का
हर लम्हा आँखों के सामने
यूँ गुजर जाता जैसे
मैंने ही गुजारा हो
कभी मान मनुहार घर
बुलाने की
पसंद का खाना खिलाने की
फिर ना जाने क्या हुआ
बातों का सिलसिला
थम गया
रिश्तों का घडा चूने लगा
धीरे धीरे बातें कम
होने लगी
दुआ सलाम भी बंद
हो गयी
अध खिला फूल
पूरा खिले ही रह गया
वो अहसास
अब मन की टीस
बन गया
याद कर के खुद को
खुश रखना मजबूरी
हो गया
कब महकेगा ?
पाक रिश्तों का फूल
कब फिर भरेगा ?
बातों का मटका
निरंतर इंतज़ार में
रहता हूँ
उम्मीद में जीता हूँ
31-07-2012
638-35-07-12

Sunday, May 6, 2012

कैसे कहूँ कभी हम उनके थे


कैसे कहूँ
कभी हम उनके थे?
हम सफ़र हम निवाले थे
उनके प्यार में मदहोश थे
समझते थे
चिपके रहेंगे ताजिंदगी
उनके दिल से
होश में आये तब तक
वो मिला चुके थे दिल
हमारे रकीब से
उतार दिया
हमें दिल से वैसे ही
जैसे उतारते थे 
माथे से बिंदी
नयी बिंदी लगाने के लिए
कैसे कहूं हम कभी
उनके थे
04-05-2012
497-12-05-12

Friday, April 20, 2012

मन की कशमकश


मैं सोचता रहता हूँ
मन की कशमकश
कह नहीं पाता
तुम भी सोचती रहती हो
कह नहीं पाती हो
हमारी खामोशी 
बीच की 
दूरियां बढ़ा रही है
ना कहने की मजबूरियां
एक बड़े तूफ़ान का
साधन बन रही हैं
क्यों इस तरह भटक कर
स्थिती को विस्फोटक
बनाएं
ना जुड़ने वाले रिश्ते की
नीव रखें
क्यों ना थोड़ा सा मैं आगे बढूँ
थोड़ा सा तुम आगे बढ़ो
अपनी कुंठाओं के बाँध को
तोड़ दें
एक दूसरे के प्रति पल रहे
अविश्वास के बादलों को
खुल कर बरसने दें
फिर से विशवास और प्रेम के
मार्ग पर चलने का प्रयत्न करें
मन मष्तिष्क से अहम्  के
बोझ को उतार फेंकें
20-04-2012
464-45-04-12

Tuesday, April 17, 2012

क्या यह प्यार नहीं है ?



कैसे कह दिया तुमने ?
मैं तुम्हें प्यार नहीं करता
तुम्हें गले नहीं लगाता
तुम्हें चूमता नहीं हूँ
अपनी बाहों में नहीं
लेता
तुम्हारे करीब नहीं हूँ
इसका अर्थ ये नहीं कि
मैं तुमसे प्यार नहीं करता
पल पल तुम्हें याद
करता हूँ
तुम्हारी कमी मुझे
व्यथित करती है
जब भी निराश होता हूँ
पूर्ण विश्वास से
तुम्हारी तरफ देखता हूँ 
तुम ही समस्या का
कोई हल सुझाओगी
मुझे समस्या से बाहर
लाओगी
मेरे जीवन की हर बात
केवल तुमसे सांझा करता हूँ
जीवन के हर विषय पर
सिर्फ तुमसे चर्चा करता हूँ
तुमसे एक दिन भी
बात ना हो
तो परेशान हो जाता हूँ
तुम्हारी कुशलता का
समाचार नहीं मिले
जब तक सो नहीं पाता
प्यार क्या सिर्फ
जिस्मानी रिश्ता ही
होता है ?
अब तुम्ही बताओ
क्या यह प्यार नहीं है ?
17-04-2012
444-24-04-12

Monday, April 16, 2012

नए को जानने से पहले



जिन्हें
कल जानता था
उनमें से कुछ याद रहे
कुछ को भूल गया
आज तक नहीं
जानता था जिन्हें
कल जानूंगा उन्हें
कुछ याद रहेंगे
कुछ को भूल जाऊंगा
कैसे थामूं ?
इस सिलसिले को
नए को जानने से पहले
जिन्हें आज जानता हूँ
उन्हें तो सहेज लूं
कुछ ऐसा कर लूं 
उन्हें कभी ना भूलूँ
16-04-2012
439-20-04-12

Monday, February 6, 2012

रिश्तों को पेपर नैपकिन मत समझो


रिश्तों को
पेपर नैपकिन मत
समझो
काम में लिया
कूड़ेदान मैं फैंक दिया
रिश्तों को
जेवर भी मत समझो
दिखाने को पहना
अलमारी के लॉकर में
बंद कर दिया
आवश्यकता पडी तो
याद कर लिया नहीं तो
दिमाग के किसी कोने में
बंद कर दिया
रिश्तों को
जूता भी मत समझो
कई दिन नहीं पहनो तो
गंदा ही पड़े रहने दो
पहनना हो तो
पोलिश लगा कर
चमका दिया
काम नहीं आये तो भी
चमका कर रखो
रिश्तों को
सेफ्टी पिन जैसा भी
मत समझो
वैसे कद्र नहीं करो
कपड़ा फट जाए तो
ढूंढते रहो
रिश्तों को नाखून भी
ना समझो
थोड़े खराब लगने लगें तो
काट कर फैंक दिया 
रिश्तों को
हीरे की कीमती अंगूठी
समझो
गंदी हो जाए तो
साफ़ कर के फ़ौरन पहन लो
रेशम का कीमती रुमाल
सा समझो
कडवाहट से गंदे होने लगे
तुरंत साफ़ करो 
करीने से
सम्हाल कर रखों 
अपने बालों सा रखो
बार बार संवारते रहो
खुद के चेहरा सा
खूबसूरत बना कर रखो
रोज़ साफ़ करो ,
प्यार की क्रीम  ,
विश्वास का पाऊडर
लगाओ 
अच्छे व्यवहार से
उनका मेकअप करो ,
उन्हें और सुन्दर
बनाओ
06-02-2012
111-22-02-12

Sunday, February 5, 2012

अब तो बता दो


अब तो बता दो
तुम्हारी ज़िन्दगी की
अलमारी के 
किस कौने में
तुमने मुझे रखा है
नए कपड़ों के जैसे
पहले खंड में,
जब भी बन ठन कर
जाना होता
उन्हें पहनते हो
या पसंदीदा
कपड़ों के जैसे
आँखों के बिलकुल
सामने
नए कपडे होते हुए भी
उन्हें ही पहनने का
मन करता
या मुझे उन
पुराने कपड़ों के जैसे
रखा है
जिन्हें ना पहने का
मन करता
ना ही फैकने का
मन करता है
या फिर टोपी,रुमाल ,
मोजों की तरह
और लोगों के साथ
एक कौने में सजा
रखा है
जो भी हाथ में आ जाए
मौके और ज़रुरत के
हिसाब से
उसे काम में ले लो
अब तो बता दो
ज़िन्दगी में तुमने
मेरा कौन सा स्थान
तय कर रखा है
05-02-2012
108-18-02-12