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Saturday, December 1, 2012

कुछ कहना चाहता हूँ तो जुबां चुप हो जाती है



विचारों के बाँध का
तटबंध तोड़ना चाहता हूँ
मन की कुंठा
निकालना चाहता हूँ
कुछ कहना  चाहता हूँ
तो जुबां चुप हो जाती है
लिखना चाहता हूँ
तो कलम रुक जाती है
क्या कहूं
क्या ना कहूं
के चक्रवात में फंस
जाती है
कुंठा कुंडली मार कर
मन में बैठ जाती है
ज़िन्दगी उलझ कर
रह जाती है
883-02-01-12-2012
मन ,कुंठा, ज़िन्दगी

Tuesday, November 6, 2012

थक गया हूँ तेरा मेरा सुनते सुनते


थक गया हूँ तेरा मेरा सुनते सुनते
थक गया हूँ
तेरा मेरा सुनते सुनते
थक गया हूँ
स्वार्थ का पेट भरते भरते
मन भर गया
रिश्तों को तोड़ते तोड़ते
उकता गया हूँ 
चेहरा बदलते बदलते
अब सोचता हूँ
क्या जैसा हूँ वैसा बन कर
नहीं रह सकता
झूठ का चोला उतार कर
नहीं फैंक सकता
टूटे रिश्तों को फिर से
जोड़ नहीं सकता
आत्म मंथन करता हूँ
खुद के प्रश्न का उत्तर
खुद ही देता हूँ
केवल इंसान बन कर जी लो
सारी कुंठाओं से मुक्त हो
जाओगे
खुशी से जियोगे
825-09-06-11-2012
सच,झूठ,स्वार्थ,आत्म मंथन,कुंठा,रिश्ते,

Wednesday, September 19, 2012

क्यों लोग पल पल में अपनी फितरत बदलते



क्यों लोग पल पल में
अपनी फितरत बदलते
देख कर भी अनदेखा करते
आशंकाओं से घिरे रहते
मन में कुंठा
दिल में भ्रम पालते
क्यों इतने विचलित रहते
हंसना चाहते
पर मुस्कारा भी नहीं पाते
असहज ही जीते रहते
740-36-19-09-2012


Friday, September 7, 2012

ना जाने क्यों लोग मन को मारते हैं


ना जाने क्यों
लोग मन को मारते हैं
खुद को समेट लेते हैं
दहशत में जीते हैं
क्यों जीवन को
सहजता से नहीं लेते हैं
कुंठाओं के जाल से
मुक्त नहीं होते
सोच के
पैमाने नहीं बदलते हैं
जीवन भर
गीली लकड़ी जैसे
सुलगते रहते हैं
जलते कम
धुंआ अधिक देते हैं
खुद भी व्यथित रहते हैं
दूसरों को भी व्यथित
करते हैं
07-09-2012
728-24-09-12

Sunday, May 6, 2012

कुंठा की अभिव्यक्ती


तुम कहते हो खामोश रहूँ 
आंसू ना बहाऊँ
भावनाओं को खुले आम ना
दर्शाऊँ
तो,क्या ग़मों को पीता रहूँ
उनका बोझ ढ़ोता रहूँ
मन हे मन घुटता रहूँ
उनके बोझ तले दब जाऊँ
उन्हें अपने भीतर इतना भर लूं
कभी उठना चाहूँ तो
उठ ही ना सकूँ
मुझे पता है तुम कहोगे
ऐसी निराशा भरी बातें
मत करो
पर ऐसा भी नहीं है
मन की कुंठाओं को
अगर बाहर नहीं निकालूँगा
तो निश्चित रूप से
निराश हो जाऊंगा
अन्धकार में चले जाऊंगा
उजाले में रह कर ,
उजाले को मुखर बनाना है
तो  कुंठा मुक्त होना होगा
कुंठा की अभिव्यक्ति
क्या कुंठा दूर करने का
उपाय नहीं है ?
यह प्रश्न उठा कर ही तुमने
मेरे अन्दर एक नयी कुंठा को
जन्म दिया
पल पोस कर वह
विकराल रूप ले ले
उससे पहले ही उसे जड़ से
काटना आवश्यक है
उसकी अभिव्यक्ती
तत्काल करना भी
आवश्यक  है 
06-05-2012

500-15-05-12

Friday, April 20, 2012

मन की कशमकश


मैं सोचता रहता हूँ
मन की कशमकश
कह नहीं पाता
तुम भी सोचती रहती हो
कह नहीं पाती हो
हमारी खामोशी 
बीच की 
दूरियां बढ़ा रही है
ना कहने की मजबूरियां
एक बड़े तूफ़ान का
साधन बन रही हैं
क्यों इस तरह भटक कर
स्थिती को विस्फोटक
बनाएं
ना जुड़ने वाले रिश्ते की
नीव रखें
क्यों ना थोड़ा सा मैं आगे बढूँ
थोड़ा सा तुम आगे बढ़ो
अपनी कुंठाओं के बाँध को
तोड़ दें
एक दूसरे के प्रति पल रहे
अविश्वास के बादलों को
खुल कर बरसने दें
फिर से विशवास और प्रेम के
मार्ग पर चलने का प्रयत्न करें
मन मष्तिष्क से अहम्  के
बोझ को उतार फेंकें
20-04-2012
464-45-04-12

Thursday, February 23, 2012

समझ नहीं आता क्या करूँ?


समझ नहीं आता
क्या करूँ?
कैसे मन की बात कहूं?
क्या लोक लाज को
छोड़ दूं?
सीमाओं को तोड़ दूं
शहर में उसे आम करूँ
खुद की हँसी उड्वाऊँ  
या चुप रह कर
घुटता रहूँ
मकडी के जाले जैसी
कुंठाओं में उलझा रहूँ
बुरी तरह जकड़ा रहूँ
दिन रात तडपता रहूँ
उन्हें और पनपने दूं
या सब्र से काम लूं
वक़्त गुजरने का
इंतज़ार करूँ
परमात्मा पर छोड़ दूं
वो ही रास्ता निकालेगा
उम्मीद में जीता रहूँ
23-02-2012
224-135-02-12

Friday, November 11, 2011

मेरी कुंठा


मेरी कुंठा
बदहजमी करती
उल्टी सी
बाहर निकलने को
मचलती रहती
तड़पती रहती
कलम के जरिये
कह सुन कर
प्रेम से,क्रोध से
सोचे,बिना सोचे
मेरी भी कोशिश
निरंतर चलती रहती
पर क्या करूँ ?
बामुश्किल
एक निकलती
दूसरी घर बनाती
ख़त्म होने का नाम
ना लेती
मेरे व्यक्तित्व को
तार तार करती
मुझे उलझाए
रखती
11-11-2011
1778-49-11-11

Thursday, September 29, 2011

कुछ और चाहिए

भाग्यवान हूँ
इश्वर बहुत कृपालु
मुझ पर
ढेर सारे  मित्र मेरे
साथ हँसते साथ गाते
सुख दुःख में साथ
निभाते
एक आवाज़ पर दौड़े
चले आते
फिर भी कुछ खालीपन
लगता
निरंतर मन मष्तिष्क को
उद्वेलित करता
कानों में सदा
अधूरेपन का स्वर
गूंजता
ह्रदय में सूनापन
अखरता
कुछ और चाहिए
मुझको ?
ढूंढ रहा हूँ उसको
जो सत्य से अवगत
करा दे
कुंठाओं को विराम दे दे
मन को चैन ,
      ह्रदय को तृप्ति दे दे       
29-09-2011
1585-156-,09-11