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Sunday, July 29, 2012

तब से अब तक



संगीत की
मदमाती धुनों के बीच
सहेलियों के साथ नृत्य में
तल्लीन थी
अचानक हाथ को
सुहावना स्पर्श मिला
एक सुखद अनुभूती का
आभास हुआ
एक सिहरन शरीर में 
दौड़ गयी
गूँज ह्रदय में पहुँच गयी
ह्रदय उल्लास से कहने लगा
यही वो सपना है
जिसे तुम
निरंतर देखती रही हो
साकार करने के लिए
अब तक भटक रही हो
जाओ उसका आलिंगन करो
उसमें समा जाओ
उस ने तुरंत गर्दन घुमायी
मनमोहिनी सूरत को
देखते ही निस्तेज हो गयी
मुंह से एक
शब्द भी नहीं निकला
अब लक्ष्य की प्राप्ती
 हो जायेगी
विचारों में मग्न अपनी
सुध बुध खो दी
यथार्थ के संसार में लौटी 
तो सब कुछ धुंधला गया
लाख प्रयत्न के बाद भी
सिवाय सहेलियों के
कोई नहीं दिखा ,
सपना टूट गया
विश्वास ही नहीं हुआ
लहर किनारे से मिलने से
पहले ही
आशाओं के समुद्र में
विलीन हो गयी
तब से अब तक फिर
लक्ष्य की खोज में
भटक रही है
29-07-2012
625-22-07-12

Monday, June 25, 2012

पहली बारिश के बाद


पहली बारिश के बाद
मन डोलने लगा
उनसे मिलने को
तरसने लगा
हम बड़ी शिद्दत से
उनके घर का दरवाज़ा
खटखटाते रहे
उनसे मिलने को
तरसते रहे
वो बेखबर
गहरी नींद में सोते रहे
सपनों की
दुनिया में गोते
लगाते रहे
25-06-2012
595-45-06-12

Tuesday, April 17, 2012

सपनों की तलाश



सुन्दर
सपनों की तलाश में
रात भर आँख बंद
कर बैठा रहा
भोर हो गयी
आस पूरी ना हुयी
बसंत बिना बहार के
उम्मीद के बादल
बिना बरसे गुजर गए
ना ख्यालों को
मुकाम मिला
ना दिल की प्यास
बुझी
17-04-2012
449-29-04-12

Saturday, February 11, 2012

इतनी ज़ल्दी कैसे भूल जाता है कोई

इतनी ज़ल्दी कैसे
भूल जाता है कोई
देख कर भी अनदेखा
करता है कोई
उम्मीदों के सपने
दिखाता है कोई
दिल लगा कर फिर
तोड़ता है कोई
ये कौन सा दस्तूर
निभाता है कोई
पुचकार कर फिर
जिबह करता है कोई
सारी हसरतें धूल में
मिलाता है कोई
मोहब्बत को बदनाम
करता है कोई
इतनी ज़ल्दी कैसे
भूल जाता है कोई
11-02-2012
150-61-02-12

Thursday, February 9, 2012

क्यों होता है सब ?

मन उदास
ह्रदय व्यथित
इतना करा,इतना सहा
फिर भी
क्यों होता नहीं कोई खुश?
सारी इच्छाएं
सारे सपने ,सारे लक्ष्य
क्यों होते हैं सब ध्वस्त?
सारी प्रार्थनाएं ,पूजा पाठ
क्यों
सब होते हैं व्यर्थ ?
क्यों सुनता नहीं इश्वर?
कब तक रोना है ?
खुश दिखना है
क्यों बताता नहीं कोई ?
सारी हिम्मत,सारे होंसले
क्यों लेते नहीं विराम ?
निरंतर चलते रहने का
करते रहने का
क्यों जाता नहीं विचार?
क्यों कम नहीं होती ?
जीने की इच्छा
कम नहीं होता
मोह अपनों का
छूटता नहीं संसार
क्यों मानता नहीं ये मन?
ना मिला जब उत्तर
किसी को
कैसे मिलेगा मुझको?
क्यों समझाता नहीं कोई?
हंसू या रोऊँ
या फिर चुपचाप सहूँ
जब ऐसे ही जीना है
ऐसे ही जाना है
समझ नहीं आता
फिर भी
क्यों व्यक्त करता हूँ ?
कुंठा अपनी
क्यों लिखता हूँ सब ?
कब,कैसे और किससे
पता चलेगा ?
क्यों होता है सब ?
09-02-2012
128—39-02-12

Tuesday, December 13, 2011

ना ज़मीं तेरी ना आस्मां तेरा ,तूं इक मुसाफिर यहाँ


ना ज़मीं तेरी
ना आस्मां तेरा
तूं इक मुसाफिर यहाँ
फिर क्यूं करता है
तेरा मेरा
देखता है सपने
निरंतर
रखता है इच्छाएं अपार
पालता है  बैर मन में
जताता है प्यार
जोड़ता रहता है
जीवन भर 
करता नहीं आराम
छोड़ जाता हैं
यहाँ का यहीं पर
सुन ले इक बात ध्यान से
इसी में गर डूबा रहा
लेगा नहीं कोई नाम तेरा
करना है तो कुछ ऐसा कर
काम इंसान के आये तूं
 
जोड़ना है तो
जोड़ लोगों का प्यार
तेरे जाने के बाद भी
करें लोग तुझे याद
ना ज़मीं तेरी
ना आस्मां तेरा
तूं इक मुसाफिर यहाँ
13-12-2011
1857-25-12

Monday, November 21, 2011

मैंने भी सपना देखा था,कोई मुझे भी मिल जाए


मैंने भी
सपना देखा था
कोई मुझे भी मिल जाए 
अपना जिसे कह सकूँ 
साथ हँसू ,साथ घूमूँ
हाथ में हाथ डाल के
छोटा सा संसार हो मेरा
स्वछन्द जिसमें रह सकूँ
खुशी से जी सकूँ
प्यार की निशानी को
जन्म दूं
घर का आँगन जिसकी
किलकारियों से गूंजे
साथ भी मिला,घर भी मिला
पर सफ़र अधूरा रह गया
काल के क्रूर हाथों से
खुशियों का संसार देखा
ना गया
मेरा देवता मुझसे
छीन लिया
जीवन शून्य हो गया
निरंतर आंसू बहाने के लिए
यादों के सहारे छोड़ दिया
कैसे सहूँ
विछोह प्रियतम का
समझ नहीं पाती हूँ
कसम खाती हूँ
अब ना देखूंगी सपना कभी
हर अबला से कहूंगी
सपनों पर विश्वास ना करे
टूटते हैं तो मौत से कम
नहीं होते सपने
मैंने भी सपना देखा था
कोई मुझे भी मिल जाए
अपना जिसे कह सकूँ .....

21-11-2011
1806-77-11-11

Sunday, November 20, 2011

रेत के घरोंदे


बहुत
समझाता था उसे
सपनों पर
विश्वास मत किया करो
समुद्र किनारे रेत के
घरोंदे  मत बनाया करो
कभी कोई तेज़ लहर 
आयेगी
घर को बहायेगी
अपने सपनों को टूटते देख
तुम व्यथित हो कर
दुःख मनाओगे
बार बार घरोंदे को
याद कर आंसू बहाओगे
घरोंदे बनाने ही हो
तो मेहनत,लगन और सब्र की
सुद्रढ़  नीव से बनाओ
जो आसानी से नहीं टूटे
जीवन भर चैन से रहने दे  
समय की तेज़ हवाएं
भाग्य की लहरें
कुछ बिगाड़ ना सके
निश्चिंतता से सो सको
पर कभी
बात नहीं मानी उसने
निरंतर रेत के घरोंदे से
सपनों पर विश्वास
करता रहा
शीघ्र पाने की इच्छा में
उतावलापन दिखाता  रहा
जीवन भर
बेघर और असंतुष्ट रहा
असंतुष्ट ही
संसार से विदा हुआ
20-11-2011
1803-73-11-11

Thursday, September 29, 2011

प्रेम की अनुभूती

आज
उनसे मिलना हुआ
प्रेम  राग का
जन्म हुआ
उनके सानिध्य के लिए
मन में तड़पने लगा 
ह्रदय  के सारे साज़
एक स्वर में बजने लगे
मन में नयी धुनें
जन्म लेने लगी
आँखें चमकने लगी
होठों से खुशी के गीत
निर्बाध 
प्रस्फुटित होने लगे
निरंतर नीरस मन में
सपने हिलोरें लगे
प्रेम की अनुभूती से 
धरती पर स्वर्ग के
दर्शन होने लगे    
29-09-2011
1584-155-,09-11

Wednesday, September 14, 2011

कल रात फिर सुबह हो गयी

कल रात फिर सुबह
हो गयी
वो सपने में दिख गयी
खिजा में बहार
लौट आयी 
निरंतर उदास चेहरे पर
रौनक आ गयी
हसरतें फिर जाग गयी
दिल की उम्मीदें परवान
चढ़ने लगी 
ठहरी हुयी ज़िन्दगी में
रवानी आ गयी
मंजिल फिर से नज़र
आने लगी
उनकी याद फिर से
सताने लगी
14-09-2011
1506-78-09-11

Saturday, September 10, 2011

हम खुशी में मदहोश हो गए

हम उनके
हुस्न के कायल थे  
उनके दीदार को
तरसते थे
दिल से उन्हें 
चाहते थे 
निरंतर बेचैनी से 
इंतज़ार करते थे
वो नज़र  आये भी
हमें देख कर 
मुस्काराए भी
हम खुशी में
मदहोश हो गए
होश में आये तब तक
वो आगे बढ़ गए
अरमानों को अधूरा
रख गए
हम अकेले के अकेले
रह गए 
10-09-2011
1479-51--09-11