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Saturday, September 1, 2012

अब फिर ज़ख्म खाने का मन करता



अब फिर ज़ख्म खाने का
मन करता
उनसे मिलने का दिल
करता
मिलेंगे तो हम पर तोहमत
लगायेंगे
हमें गुनाहगार करार देंगे
शहर भर में रुसवा करेंगे
हमें तो
आदत है ज़ख्म खाने की
चुपचाप दर्द सहने की
हमें गम नहीं होगा उनके
नफरत भरे अंदाज़ का
इस बहाने उन्हें देख तो लेंगे
कुछ अरसे
उनके ज़हन में तो रहेंगे
01-09-2012
707-03-09-12

Tuesday, July 17, 2012

अच्छा हो अब ज़ख्म ना भरे कोई


अच्छा हो अब
ज़ख्म ना भरे कोई
गुजार लिए दिन
दर्द सहते सहते कई
आदत सी पड गयी
क्यूं शौक लगाऊँ
अब नया कोई
लगा भी देगा
अगर मरहम कोई
कैसे यकीन करूँ
नया दर्द नहीं देगा
फिर कोई
इस हाल में ही खुश हूँ
बस मुस्करा देख ले
अब कोई
17-07-2012
609-06-07-12

Tuesday, April 17, 2012

दर्द को बुलावा ना दो


ज़ख्मों को कुरेद कर
दर्द को बुलावा ना दो
मुस्काराते चेहरों को
दिल का चारागार ना
समझो
वो कातिल-ऐ-दिल होते हैं
पहले भी खाई है चोट तुमने
कई बार देखे हैं
उनकी बेवफायी के जलवे
अब छोड़ दो
मोहब्बत का इरादा
ज़ख्मों को फिर हरा
ना होने दो
इस बार जो फँस गए
उनके जाल में
वफ़ा की उम्मीद में
कहीं जाँ से हाथ ना
धो बैठो
17-04-2012
452-32-04-12

Tuesday, March 20, 2012

शुक्रगुजार हूँ


शुक्रगुजार हूँ 
जो इतने ज़ख्म
तुमने मुझे दिए
उन्हें देख कर
तुम्हें याद 
तो करता ही हूँ
अहसास भी करता हूँ
कोई अपना ही था
कोई दुश्मन 
होता तो बर्दाश्त
 नहीं करता
आपा खो देता
मुंह तोड़ कर
जवाब दे देता
20-03-2012
418-152-03-12

Saturday, March 17, 2012

जब अपने ही ज़ख्म देते हैं


जब
अपने ही ज़ख्म देते हैं
किसी और की ज़रुरत
नहीं होती
जीने की ख्वाइश भी
नहीं रहती
जब हँसना मुमकिन
नहीं होता
दिल टूट कर बिखर
चुका हो
गम दोस्त बन जाता
रोना ही साथ निभाता है
जब हर लम्हा मुझ को
मरना है
तो जी कर भी क्या
करना है
कैसे मुक्त हो जाऊं
बस अब यही सोचना है
17-03-2012
395-129-03-12

Saturday, October 15, 2011

शोख अंदाज़ अब मायूसी में बदल गया


ज़ख्म खाना
रोज़ का काम हो गया
भरी दोपहर अन्धेरा
छा गया
रात दिन में फर्क
करना  
मुश्किल हो गया
सहना आदत में
शुमार हो गया
सब्र अब मरहम
बन गया
निरंतर बेबसी में
जीना
मजबूरी बन गया
शोख अंदाज़
अब मायूसी में
बदल गया
15-10-2011
1657-65-10-11

Monday, October 3, 2011

निरंतर ज़ख्म खाए हैं


निरंतर 
ज़ख्म खाए हैं 
अब ज़ख्मों से 
खौफ खाता हूँ
खता कोई भी हो
जाए
मुझ से नाराज़
ना होना
अग्रज समझ कर
माफ़ कर देना
धीरे से समझा देना
बहुतों ने दिल को
बार बार तोड़ा 
तुम ना इसे तोड़ना
बड़े अरमानों से 
रिश्ता
जोड़ा है तुमसे
हर हाल में
इसे कायम रखना
02-10-2011
1598-07-10-11