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Wednesday, September 28, 2011

बेटी



बेटी

ह्रदय का अंग होती

उसकी पीड़ा सही

ना जाती

व्यथा उसकी

निरंतर रुलाती

ह्रदय को तडपाती

एक पल भी चैन नहीं

लेने देती

मन सदा

उसकी कुशल क्षेम चाहता

उसके प्यार में  डूबा

रहता

बेटी का जन्म

पिता का सबसे

महत्वपूर्ण सृजन होता

प्रेम निश्छल,निस्वार्थ होता

उसकी खुशी ह्रदय की

सबसे बड़ी खुशी होती

बेटी ,पिता के जीवन में

खिलती धूप सी होती

उसकी कमी

अन्धकार से कम

ना होती

बेटी  पिता को

परमात्मा की भेंट होती

उसके नाम से ही आँखें

नम होती 

28-09-2011
 1577-148-,09-11


Friday, July 1, 2011

तुम मौसी , तुम्हारी बेटी मेरी बहन होगी (काव्यात्मक लघु कथा)


आज फिर घर से
निकलने में देर हो गयी
बुखार और दर्द के कारण
नींद पूरी ना हुयी
मालकिन की डांट
खानी पड़ेगी
पेट के खातिर हर
तकलीफ सहनी होगी
खुद दसवी पास थी
चाहते हुए भी
आगे नहीं पढ़ सकी
बिटिया को पढ़ा लिखा कर
अफसर बनायेगी
उससे बर्तन नहीं मंजवायेगी
सोचते,सोचते अपनी धुन में
चली जा रही थी
पता नहीं चला
कब बस ने टक्कर मार दी
काफी देर सड़क पर पडी रही
किसी ने रहम की भीख दी
सरकारी अस्पताल पहुँची
आँख खुली तो पलंग पर
पडी थी
एक टांग कट गयी थी
बगल में नर्स खड़ी थी
घर में कौन कौन है ?,
क्या काम करती है?
कहाँ रहती है ?
सवालों की झडी लगा दी
जवाब देते देते थक गयी
नर्स के जाने के बाद
आँखों से आंसूं बहाने लगी
बेटी की याद सताने लगी
भूखी और परेशान होगी ,
अब कैसे उसकी देखभाल होगी ?
कैसे उसका पेट पालेगी ?
कैसे पढ़ायेगी लिखायेगी ?
भविष्य की चिंता सताने लगी
सब सोच कर छटपटाने लगी
सोचते सोचते सो गयी
आँख खुली तो नर्स 
बेटी के साथ खड़ी थी
कहने लगी में अकेली हूँ
बूढ़ी अपाहिज और अंधी
माँ के साथ रहती हूँ
मेरी माँ भी बर्तन मांजती थी
उसकी भी टांग
बस की टक्कर से कटी थी
बहुत मुश्किल से
मेरी परवरिश करी
नहीं चाहती,तुम्हारी बेटी को
निरंतर ज़िल्लत सहनी पड़े
दाने दाने के लिए रोना पड़े
तुम मेरी माँ को सम्हालना
बेटी को पढ़ाना लिखाना
मैं तुम्हें सहारा दूंगी
अब से परिवार में हम
दो नहीं चार होंगे
तुम मौसी,तुम्हारी बेटी
मेरी बहन होगी
01-07-2011
1120-04-07-11

Thursday, March 17, 2011

साहब का चपडासी था , इस बात का रूतबा था



साहब का चपडासी था
इस बात का रूतबा था
साहब से डांट खाता,
गुस्सा,फ़रियाद ले कर
आने वालों पर उतारता
साहब व्यस्त हैं ,
ज़ल्द बाज़ी मत करो
बाद में आना कह कर
उन्हें अपना महत्त्व बताता
चाय पानी के पैसे
कभी छोटा मोटा
उपहार देने वालों पर
क्रपा रखता
उनकी पर्ची नीचे से
ऊपर करता
कब साहब का मूड ठीक है
कान में बताता
जो उसका ध्यान नहीं रखता,
उसकी पर्ची ऊपर ना
आने देता
साहब का मूड खराब हो
तो फौरन अन्दर भेजता 
साहब के सामने भीगी
बिल्ली बनता
बेटा बेटी बीमार हो
अस्पताल में दिखाना हो
फ़रियाद से पहले 
दस बार सोचता
जब साहब पुराने होते
हर आदत पहचानता
पसंद,नापसंद
अच्छी तरह पहचानता
कमजोरियां भी 
खूब जानता  
मिलने आने वाले 
क्या काम करते
सब मालूम करता 
खुद के काम भी
आसानी से निकालता
रहने का स्तर 
तनखा से ज्यादा था
बीस बरस बाद भी 
साहब का
चपड़ासी रहना चाहता
उसे पता था साहब 
तरक्की पाते पाते
सबसे बड़े साहब बनेंगे
उस के बच्चों की 
नौकरी का प्रबंध
भी करेंगे
इस लिए पूरी 
तन्मयता से
उनकी सेवा करता
साहब चाहे जल्लाद हो
उन्हें देवता कहता
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
444—114-03-11


भद्दा चेहरा अच्छे मेकअप से,विकृत शरीर सुन्दर कपड़ों से ढका है



पहले पहाड़ों में
छोटे से गाँव में रहता था
छोटी छोटी कंकरीली 
पगडंडियों से
आना जाना आफत 
लगता था
कहीं भी जाना हो 
समय बहुत लगता
निरंतर सोचता 
शहर जैसी सडकें होती तो
कितना अच्छा होता
फौरन यहाँ से वहाँ पहुंचता
अब बरसों की इच्छा पूरी हुयी
शहर में नौकरी लग गयी
आज वो डामर की सड़क पर
मक्खन पर चाकू चले 
ऐसे चल रहा
 ऐसा लग रहा जैसे 
उड़ कर जा रहा
बहुत खुश था
मगर ज्यादा वक़्त 
ना रह सका
जब व्यस्त सड़क पर पहुंचा
आती जाती गाड़ियों के 
धुएं से पाला पडा
नाक में धुएं को सूंघते सूंघते ,
दर्द से सर फटने लगा
सड़क के दोनों तरफ 
पेड़ों का नामों निशाँ ना था
दोनों तरफ की झाड़ियाँ धुएं से
काली पड गयी थी
पोलीथीन की थैलियों,
गुटके के पाउचों से भरी थी
तभी चलती कार से 
किसी ने पीक मारी
छींटों ने चेहरा और 
कमीज़ खराब कर दी
चेहरा रुमाल से साफ़ किया
होर्न की आवाजों और धुएं ने
सर दर्द बढ़ा दिया
फौरन घर लौटने का 
फैसला किया
लौटते हुए सोचने लगा ,
गाँव का रास्ता 
पथरीला और छोटा सही
मगर गंदा ना था , 
ना धुंआ ना शोर था
पेड़ों की छाया से ढका था ,
झाड़ियों में फूलों का 
मेला होता था
शोर की जगह
कोयल की कूंक और 
बुलबुल की र्चीच्यू ,
मोर की पियाऊँ सुनायी देती
ठंडी बयार मन को 
शांत रखती
समझ नहीं आता
क्यूं इंसान निरंतर गाँव से
शहर की ओर भागता
ज्यादा पैसे और 
भौतिक सुखों के सिवा
सब कुछ खोता
ऐसा लगता जैसे
भद्दा चेहरा अच्छे 
मेकअप से
विकृत शरीर सुन्दर 
कपड़ों से ढका है

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
442—112-03-11

Wednesday, March 16, 2011

वो निरंतर ऐसा ही करती,मेरा फ़ोन नहीं उठाती




वो निरंतर
ऐसा ही करती
मेरा फ़ोन नहीं उठाती
बार बार रीडायल करते करते
ऊँगलियाँ थकती
मन में घबराहट होती
चेहरे पर चिंता की लकीरें
साफ़ दिखती
इश्वर को याद करता रहता
वो ठीक से हो, प्रार्थना करता
ध्यान कहीं और लगाने की
कोशिश करता
मगर ऐसा ना होता
बार बार निगाहें घड़ी को देखती
बेचैनी बढ़ती जाती
अजीब अजीब आशंकाएं
दिमाग में आती
किसी मिलने वाले का
नंबर ढूंढता
उसे फ़ोन मिलाता शायद
उसे कुछ पता हो
यहाँ भी निराश होना पड़ता
कमरे में इधर उधर घूमता
क्रोध भी आने लगता
क्यों कहना नहीं मानती
कितनी बार समझाया
घंटे दो घंटे में फ़ोन किया करो
अपनी खैरियत बताया करो
इस बार फिर डांट
लगाऊंगा 
फिर ऐसा नहीं करे वादा
करवाऊंगा
मन बहुत परेशान होता
अपने को असहाय पाता
हनुमान चालीसा का पाठ
करना शुरू करता
तभी फ़ोन की घंटी बजती
बिटिया की आवाज़ आती
पापा आई ऍम सौरी
फ़ोन साईंलेंस मोड़ पर था
आपके फ़ोन का पता ना चला
मेरी सांस में सांस आती

आँखें नम हो जाती
दिल में खुशी की
अजीब सी अनुभूति
होती
16—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
440—110-03-11