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Sunday, September 2, 2012

होश में भी मदहोश हो बैठे



होश में भी मदहोश हो बैठे
दवा समझ कर शराब पी बैठे
उनसे नज़रें मिली तो दिल दे बैठे
सुकून की जगह बेचैनी ले बैठे
बेफिक्र हो कर सोते थे पहले
अब पलक तक झपका ना पाते
बैठे ठाले रतजगा गोद ले बैठे
दर्द-ऐ-दिल की दवा चाही थी
कातिल को चारागार समझ बैठे
चारागार –डाक्टर
02-09-2012
710-06-09-12

Wednesday, April 18, 2012

क्यों बेफिक्र हो जाते हो ?

क्यों बेफिक्र हो
जाते हो ?
जब जब चलता है
सब ठीक ठाक
हँसते हो खिलखिलाकर
भूल जाते हो
आते हैं अवरोध
सबके  जीवन में
जब दिए हैं इश्वर ने
आँखों में आंसू
वह भी तो निकलेंगे
एक दिन
घबराओ नहीं
सब्र से काम लो
हँसी भी दी उसी ने
वही फिर हँसायेगा
तुम्हें एक दिन
(हँसने से अर्थ जीवन में अच्छे समय से है,रोने से अर्थ जीवन की विपत्तियों से है)
18-04-2012
460-41-04-12

Friday, April 1, 2011

जीवन सफ़र में मील के पत्थर क्यूं नहीं होते?


जहन में
सवाल सदा से उठता
जीवन सफ़र में
मील के पत्थर क्यूं नहीं होते?
कितना चले ,कितना चलना
पता चलता रहता
कितने अवरोध पार किये
सब को याद रहते
कितने पार करने
पता कहाँ  चलता ?
पार होंगे,ना होंगे
छोटे होंगे या बड़े होंगे
किसी को पता ना होता
मंतव्य इसका
खुदा ने जाना होगा
बेफिक्र ना चले कोई
निरंतर चौकन्ना रहे
जीवन सफ़र में
सोच कर मील का
पत्थर ना लगाया होगा
01-04--11
577—10 -04-11