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Saturday, May 12, 2012

फलक के सितारे भी पूछते हैं मुझसे

फलक के सितारे भी
पूछते हैं मुझसे
तेरी रुसवाई का
राज क्या है
क्या ऐसा किया मैंने
जो उल्फत से नवाज़ा
तुमने
मेरी तरफ देख कर
मुस्कराना तक छोड़ दिया
कैसे बताऊँ उन्हें
मेरा कसूर सिर्फ
इतना था
तुमसे मोहब्बत का
इज़हार किया था
12-05-2012
513-27-05-12

Tuesday, April 17, 2012

उसके रुसवा होना से.....


उसके रुसवा होना से
ज़िंदा रहना दुश्वार
हो गया
किस उम्मीद से
घर के दरवाज़े पर
खडा होऊँ ?
अब तो घर के सामने से भी
कोई गुज़रता नहीं
मेरे दिल के आँगन जैसे
मेरे घर की गली भी
सुनसान हो गयी
दिल टूट कर बिखर
ना जाए कहीं
वक़्त से पहले ही
तन्हायी जान ना ले ले
अब शहर से ही रुखसत
लेनी होगी
उम्मीदों की नगरी
कहीं और बसानी होगी
17-04-2012
447-27-04-12

Saturday, January 7, 2012

मुझे हक तो नहीं फिर भी नाराज़ हूँ

मुझे हक तो नहीं
फिर भी नाराज़ हूँ
तुमसे
रिश्तों की दुहाई दूं
या साथ गुजारे वक़्त की
याद दिलाऊँ
वजह कुछ भी हो
तुम जानती हो तुम्हारी
रुसवाई वाजिब नहीं
मेरी वफाई पर कोई
दाग नहीं
तुमने ही उकता कर
किनारा कर लिया
इलज़ाम बेरुखी का
लगा दिया
ये भी ना सोचा
तुम्हारे खातिर ही 
खामोश रहते थे हम
बदनाम ना हो जाओ
मिलने की कोशिश नहीं
करते थे हम
07-01-2012
19-19-01-12

Sunday, December 25, 2011

हमें फिर से हँसना सिखा दो

क्या हुआ गर
ज़ख्म कहीं और खाए
किसी और की
रुसवाई का शिकार हुए
हम बीमार-ऐ-इश्क हैं
तुम्हें दिल का
चारागर समझते
बड़ी उम्मीद से
वास्ते इलाज आये हैं
थोड़ा सा
अहसान हम पर कर दो
हमदर्दी का मरहम
लगा दो
दर्द-ऐ-दिल सुन लो
जो हुआ उसे भूलना
सिखा दो
मोहब्बत पर यकीं
फिर से
कायम करवा दो
हमें फिर से हँसना
सिखा दो

(चारागर =चिकत्सक,डाक्टर)
25-12-2011
1888-56-12

Saturday, December 24, 2011

उनकी याद ही काफी है अब रुलाने के लिए

उनका
 ज़िक्र ही काफी है
दिल जलाने के लिए
उनकी याद ही काफी है
अब रुलाने के लिए
उनकी रुसवाई देख ली
हँसते हँसते जान लेने की
अदा देख ली
वादों की कुर्बानी देख ली  
दोजख का
अहसास कर लिया
ज़मीं पर
अब कुछ बाकी नहीं
देखने के लिए
24-12-2011
1887-55-12

Friday, December 23, 2011

अब क्या देखना बाकी है?


तुम्ही बताओ
अब क्या देखना 
बाकी है?
हमने तुम्हारी रुसवाई
देख ली
तुम्हारी महफ़िल से
हमारी विदाई देख ली
दिन के उजाले में
अंधेरी रात देख ली
भरी पूरी दुनिया में
तन्हाई देख ली
हसरतों की मौत
देख ली
अब देखना को
बचा ही क्या है?
मोहब्बत में
नफरत की इन्तहा
देख ली
हमने जीते जी
क़ज़ा देख ली
23-12-2011
1881-49-12

Sunday, April 3, 2011

अब गमों से दोस्ती कर ली

अब गमों से दोस्ती
कर ली
उनकी रुसवाई को हाँ
कह दी
दिल में मलाल नहीं
गिला शिकवा उनसे
भी नहीं
मोहब्बत का मतलब
उन्हें पता नहीं
मोहब्बत को उन्होंने
खेल समझा
दिलों से खेलना शौक
उनका
सिला उन्हें पता नहीं
भूल जाते
जो खंजर के सहारे जीते
निरंतर खंजर से मारे जाते
खुदा उन्हें माफ़ करे
हमें मोहब्बत से जीना
हम जीते रहेंगे
उनसे मोहब्बत करते रहेंगे
मुकाबला उनसे ना करेंगे
मोहब्बत से जीते रहेंगे
03-04--11
588—21 -04-11