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Monday, September 26, 2011

प्रभु मुझे फिर से हँसाओ

प्रभु कैसी
लीला तुमने रचायी
क्यों दुखों की दुनिया
दिखायी ?
मेरे सपनों की दुनिया में
क्यों आग लगायी ?
रातों की नींद उडायी
बेचैनी से दोस्ती करायी
ना मन को कुछ सूझे
ना दिल को कुछ भाए
निरंतर आँखों से आंसूं
बहते जाएँ
हंसना मुस्काराना
इतिहास हो गए
जीवन मरण इकसार
हो गए
जो बीत रहा मुझ पर
अब सहा नहीं जाए
कैसे किसी को बताऊँ?
किस से आस लगाऊँ ?
कहाँ जा कर शीश
 नवाऊँ ?
किस मंदिर में पूजा करूँ?
पथ मुझे दिखाओ
अब और ना तडपाओ
निरंतर रुदन से मुक्त करो
कोई नया लीला रचाओ 
26-09-2011
1559-130-09-11

Tuesday, July 26, 2011

राम कहूं या अल्ला, क्या फर्क पड़ता ?

मंदिर जाऊं

या मस्जिद जाऊं
क्या फर्क पड़ता ?
पूजा करूँ

या इबादत करूँ
क्या फर्क पड़ता ?
जब नाम उसका लेना
उसका कहा करना
इंसानियत से जीना
राम कहूं या अल्ला
क्या फर्क पड़ता ?

26-07-2011

1234-114-07-11

Saturday, June 25, 2011

वो मंदिर भी जाता,मस्जिद भी जाता

वो मंदिर भी जाता  
मस्जिद भी जाता
दीपावली,ईद दोनों
मनाता  
रमजान में रोजे
पर्यूषण में उपवास
रखता  
क्रिसमस चर्च में
मनाता
मत्था गुरुद्वारे में 
टेकता
निरंतर खुदा की
इबादत में डूबा
रहता  
कोई सिरफिरा
कोई पागल कहता
उसकी नज़रों में
खुदा हर रूप में
एक था

सर्वधर्म सुखाय
उसका सोच था  
बेफिक्र जीता था 
25-06-2011
1097-124-06-11