मेरे ग़मों को
मुझे ही
सहने दो
आंसूओं को पीने
दो
ना चुप कराओ
ना एक लफ्ज़
हमदर्दी का
कहो
जो लिखा मेरी
किस्मत में
मुझे ही भुगतने
दो
जो चाहते नहीं
हँसू कभी
उन्हें खुल
कर हँसने दो
उनके दिल को
सुकून
मिलने दो
बस एक ख्वाहिश
बाकी है दिल
में
दुनिया से जाने
से पहले
एक बार मैं
भी खुल कर
हँस लूं
एक छोटी सी
गुजारिश मेरी
चाहने वालों
से
बस इतनी सी
दुआ
कर लो
26-08-2012
699-59-08-12
हमारे चेहरे पर
दर्द ही क्यों देखते हो
दिल में झाँक कर भी
तो देखो
हमदर्दी से लबरेज़
दर्द के साथ मोहब्बत
भी ज़िंदा है उस में
भाई चारे से जीने की
ख्वाइश भी है इसमें
ये भी हकीकत है
कई बार अपनों से
चोट खाई है
पर उनके नाम का
खुलासा नहीं करते
कभी
जब याद आ जाते हैं
वो वाकये
ना चाहते हुए भी
चेहरे पर दर्द आ
जाता है
15-03-2012
382-116-03-12
ना कोई समझा
ना ही जाना हमें
हँसने की चाह ने
इतना रुलाया हमें
जीना ही भूल गए
हमदर्दी की आस में
दर्द गले लगाते रहे
ना बची अब कोई चाह
ना किसी से कोई आस
हर शख्श से
खौफ खाते हैं हम
फिर ज़ख्म खाने से
डरते हैं हम
अब सोच लिया हमने
खामोशी से सहते रहेंगे
कहेंगे नहीं अपने दर्द
अब किसी से
चले जायेंगे दुनिया से
इक दिन यूँ ही
रोते रोते
11-02-2012
148-59-02-12
अच्छा- बुरा
मैं किसी के लिए
बुरा
कोई मेरे लिए
अच्छा
फिर शिकायत
किस बात की
*
आडम्बर
खुद के आडम्बर का
पता नहीं चलता
दूसरों का बुरा लगता
*
जब मन रोता
जब मन रोता
आँसूं भी नहीं निकलते
अन्दर ही अन्दर
मनुष्य को खोखला
कर देते
कितना धन आवश्यक
खुदा
बहुत बड़ा अहसान
करता
अगर पैदा होते ही
बता देता
कितना धन आवश्यक
होगा
*
कल की चिंता
कल की चिंता में
घुलते हैं
आज बर्बाद करते हैं
*
हमदर्दी
लोग
हमदर्दी में भी
कंजूसी करते
हमदर्दी की उम्मीद
करते
*
राजनीति के राज़
राजनीति
के राज़
आम आदमी से
छुपे रहते
जिनके नाम पर
नेता
राजनीति करते
*
करूणा
करूणा का
करुण सत्य
कई बार दिखाने के
लिए की जाती
*
जिन्हें जानते नहीं
जिन्हें जानते नहीं
उन्हें जानने की इच्छा
रखते हैं
जानने के बाद
याद रखें या भूल जाएँ
सोचते रहते हैं
*
खुद जीते तो
खुद जीते तो
काबलियत
दूसरा जीते तो
किस्मत
*
गम-खुशी
उनका गम मेरी खुशी
मेरा गम उनकी खुशी
*
सुना था
परमात्मा
सर्वत्र होता
ढूंढा मंदिर
मस्जिद में जाता
*
आशीर्वाद
मुँह मुंबई की तरफ
जाना दिल्ली चाहते
काम दानवों का करते
आशीर्वाद भगवान्
का चाहते
*
गाली
का जवाब
गाली से दिया
उसमें
तुम में क्या फर्क
रहा
19-12-2011
1870-38-12
जिनके
दिल ज़ख्मों से भरे
वो अब हमदर्दी जताते
खुद की किश्ती
मंझधार में फंसी
हमें तैरना सिखाते
हमारे प्यार का
निरंतर तमाशा बनाते
खुद दो कदम
साथ ना चल सके
हमें साथ चलने की
नसीहत देते
हम तो फिर भी सुन लेंगे
उनका कहा कर लेंगे
उन्हें कौन किनारे कौन
लगाएगा ?
इस गम में निरंतर
ग़मगीन रहते
15-10-2011
1658-66-10-11