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Sunday, August 26, 2012

मेरे ग़मों को मुझे ही सहने दो



मेरे ग़मों को मुझे ही
सहने दो
आंसूओं को पीने दो
ना चुप कराओ
ना एक लफ्ज़
हमदर्दी का कहो
जो लिखा मेरी किस्मत में
मुझे ही भुगतने दो
जो चाहते नहीं हँसू कभी
उन्हें खुल कर हँसने दो
उनके दिल को सुकून
मिलने दो
बस एक ख्वाहिश
बाकी है दिल में
दुनिया से जाने से पहले
एक बार मैं भी खुल कर
हँस लूं
एक छोटी सी
गुजारिश मेरी
चाहने वालों से
बस इतनी सी दुआ
कर लो
26-08-2012
699-59-08-12

Thursday, March 15, 2012

चेहरे पर दर्द ही क्यों देखते हो

हमारे चेहरे पर
दर्द ही क्यों देखते हो
दिल में झाँक कर भी 
तो देखो
हमदर्दी से लबरेज़ 
 दर्द के साथ मोहब्बत 
भी ज़िंदा है उस में
भाई चारे से जीने की
ख्वाइश भी है इसमें
ये भी हकीकत है
कई बार अपनों से 
चोट खाई है
पर उनके नाम का
खुलासा नहीं करते
कभी
जब याद आ जाते हैं
वो वाकये
ना चाहते हुए भी
चेहरे पर दर्द आ
जाता है
15-03-2012
382-116-03-12

Saturday, February 11, 2012

ना कोई समझा ना ही जाना हमें

ना कोई समझा
ना ही जाना हमें
हँसने की चाह ने
इतना रुलाया हमें
जीना ही भूल गए
हमदर्दी की आस में
दर्द गले लगाते रहे
ना बची अब कोई चाह
ना किसी से कोई आस
हर शख्श से
खौफ खाते हैं हम
फिर ज़ख्म खाने से
डरते हैं हम
अब सोच लिया हमने
खामोशी से सहते रहेंगे
कहेंगे नहीं अपने दर्द
अब किसी से
चले जायेंगे दुनिया से
इक दिन यूँ ही
रोते रोते
11-02-2012
148-59-02-12

Monday, December 19, 2011

क्षणिकाएं -11



अच्छा- बुरा
मैं किसी के लिए
बुरा
कोई मेरे लिए
अच्छा
फिर शिकायत
किस बात की
*
आडम्बर
खुद के आडम्बर का
पता नहीं चलता
दूसरों का बुरा लगता
*
जब मन रोता
जब मन रोता
आँसूं भी नहीं निकलते
अन्दर ही अन्दर
मनुष्य को खोखला
कर देते
कितना धन आवश्यक
खुदा
बहुत बड़ा अहसान
करता
अगर पैदा होते ही
बता देता
कितना धन आवश्यक
होगा
*

कल की चिंता
कल की चिंता में
घुलते हैं
आज बर्बाद करते हैं
*
हमदर्दी
लोग
हमदर्दी में भी
कंजूसी करते
हमदर्दी की उम्मीद
करते
*
राजनीति के राज़
राजनीति
के राज़
आम आदमी से
छुपे रहते
जिनके नाम पर
नेता
राजनीति करते
*
करूणा
करूणा का
करुण सत्य
कई बार दिखाने के
लिए की जाती
*
जिन्हें जानते नहीं
जिन्हें जानते नहीं
उन्हें जानने की इच्छा
रखते हैं
जानने के बाद
याद रखें या भूल जाएँ
सोचते रहते हैं
*
खुद जीते तो
खुद जीते तो
काबलियत
दूसरा जीते तो
किस्मत
*
गम-खुशी
उनका गम मेरी खुशी
मेरा गम उनकी खुशी
*
सुना था
परमात्मा
सर्वत्र होता
ढूंढा मंदिर
मस्जिद में जाता
*
आशीर्वाद
मुँह मुंबई की तरफ
जाना दिल्ली चाहते
काम दानवों का करते
आशीर्वाद भगवान्
का चाहते
*
गाली
का जवाब
गाली से दिया
उसमें
तुम में क्या फर्क
रहा
19-12-2011
1870-38-12

Saturday, October 15, 2011

उन्हें कौन किनारे कौन लगाएगा ?


जिनके
दिल ज़ख्मों से भरे
वो अब हमदर्दी जताते
खुद की किश्ती
मंझधार में फंसी
हमें तैरना सिखाते
हमारे प्यार का
निरंतर तमाशा बनाते
खुद दो कदम
साथ ना चल सके
हमें साथ चलने की
नसीहत देते
हम तो फिर भी सुन लेंगे
उनका कहा कर लेंगे
उन्हें कौन किनारे कौन
लगाएगा ?
इस गम में निरंतर
ग़मगीन  रहते
15-10-2011
1658-66-10-11