Sunday, June 3, 2012

जब से मिला हूँ तुमसे

जब से मिला हूँ तुमसे
जो काटने को दौड़ता था
अब अच्छा लगने लगा
मन खुश
दिल मदहोश रहने लगा
चेहरा चमकने लगा
जब से मिला हूँ तुमसे
रातों को जागने
दिन में ख्वाब देखने लगा
ख्यालों में खोने लगा
जब से मिला हूँ तुमसे
आसमान में उड़ने का
नाचने गाने का मन
करने लगा
जीने का मकसद
मिल गया
जब से मिला हूँ तुमसे
खुदा पर यकीन होने लगा
निरंतर दुआ करने लगा
जब से मिला हूँ तुमसे
सब कुछ बदल गया
मोहब्बत का मतलब
समझ गया
03-06-2012
559-79-05-12

आज फिर ज़ख्म हरे हो गए

आज फिर ज़ख्म हरे
हो गए
वो हमारे सामने से
निकल गए
देख कर भी अनदेखा
कर गए
अपनी तंगदिली पर
मोहर लगा गए
ये ज़रूरी नहीं है
खूबसूरत चेहरों के
दिल भी खूबसूरत हो
हमें हकीकत से
रूबरू करा गए
03-06-2012
558-78-05-12

कैसे हाँ कहूँ ? जब ना कहना चाहता हूँ ?

कैसे हाँ कहूँ ?
जब ना कहना चाहता हूँ ?
पर ना भी कैसे कहूँ?
समझ नहीं पाता हूँ
झंझावत में फंसा हूँ
रिश्तों के बिगड़ने का खौफ
दुश्मनी मोल लेने का डर
मुझे ना कहने से रोकता है
कैसे उसूलों को तोडूँ
मन को दुखी कर के हाँ कहूँ
दुविधा में फंसा हूँ
क्यों ना एक बार
नम्रता से ना कह दूं
सदा के लिए दुविधा से
मुक्ती पा लूँ
कुछ समय के लिए
लोगों को नाराज़ कर दूं
समय के अंतराल में
सब समझ जायेंगे
आदत समझ कर भूल
जायेंगे
मेरा मन खुश रहेगा
फिर हाँ ना के झंझावत में
नहीं फंसेगा
03-06-2012
557-77-05-12
 (जीवन में अक्सर ऐसी स्थिति आती है जब इंसान ना कहना चाहता है,पर रिश्तों में कडवाहट के डर से घबराता है ,और अनुचित बात के लिए भी हाँ कह कर मन को दुखी करता है)

Saturday, June 2, 2012

उजड़ गयी जब फसल सारी



उजड़ गयी
जब फसल सारी
तुम पूछते
खलिहान कहाँ है
बिखर चुका
जब परिवार सारा
तुम पूछते घर कहाँ है
खुद गए
रास्ते में गडडे
अब पूछते हो
रास्ता कहाँ हैं
कैसे बताऊँ
खुद ने ही मारी थी
कुल्हाड़ी
अपने पैरों पर
चढ़ाया था
सब को सर पर
समझाया था
कोई बड़ा नहीं
कोई छोटा नहीं
सब बराबर घर में
02-06-2012
556-76-05-12

बेचैनी का दामन थाम लिया


आज मैंने उन्हें
मुस्कराते देख लिया
खुद को
मोहब्बत के जाल में
फंसा दिया
हसरतों को न्योता
दे दिया
खुद की मुस्काराहट को
उनके नाम कर दिया
बेचैनी का दामन
थाम लिया
02-06-2012
555-75-05-12

घर की खामोशी



घर की खामोशी
हर पल दिल को
चीरने लगी
आपस में कलह
साफ़
दिखने लगी
सुबह को ही शाम
होने लगी
एक दूसरे पर ऊंगली
उठने लगी
प्रेम पर नफरत
हावी होने लगी
अहम् की जीत
हो गयी
अहम् ने
सत्ता हाथ में ले ली
परिवार के बिखरने की
रिश्तों के टूटने की 
शुरुआत हो गयी
02-06-2012
554-74-05-12

ये कैसी ज़िन्दगी?



ये कैसी ज़िन्दगी?
जिसमें रंग नहीं
खुशी नहीं 
गले मिल कर
हँसना नहीं
मिलजुल कर
रहना नहीं
कल क्या होगा?
कल क्या करना है?
कैसा बीतेगा समय?
इसी ऊहापोह में
गुजरता हर दिन
गिले शिकवे निरंतर
हावी रहते  दिमाग पर
ना मन को चैन
ना ह्रदय में खुशी
मजबूरी में
जिए जा रहे सब
02-06-2012
553-73-05-12


हर सुबह ऐसी ही होगी

सूरज ने अंगडाई ली
कोपलें हँसने लगी
ओस की बूँदें
चमकने लगी
मंद बयार चलने लगी
धूल उडाती गायें
चरने निकल पडी 
परिंदों ने मुनादी
कर दी
सुबह हो गयी
नयी नवेली दुल्हन ने
भी आँखें खोली
आधी नींद में
चुल्हा फूंकने लगी
अब ज़िन्दगी भर
हर सुबह
ऐसी ही होगी  
02-06-2012
552-72-05-12

सब आँखें बंद कर चल रहे हैं



सब आँखें
बंद कर चल रहे हैं
फिर भी गिरने से
डर रहे हैं
सुकून की तलाश में
नफरत के
शोले भड़का रहे हैं
काँटों की डगर को
फूलों की
सेज समझ रहे हैं
बंद पलकों से
सुनहरे सपने देख रहे हैं
खुद पत्थर मार रहे हैं
फूलों की ख्वाहिश
रख रहे हैं

सब आँखें
बंद कर चल रहे हैं

02-06-2012
551-71-05-12