Wednesday, May 30, 2012

बुढापा ऐसा ही होता है


पुराने पेड़ को देखा तो
किसी बूढ़े सा नज़र आया
मोटा तना उम्र बता रहा था
कम डालियाँ,कम पत्ते
समय की कहानी दर्शा रहे थे
ऐसा लगा बूढा शरीर
बिना वस्त्राभूषण मजबूरी में
जिए जा रहा हो
गौर से देखा
कोई घोंसला तो नहीं दिखा
दो तीन पक्षी अवश्य दिखे
जिन्होंने बसेरे तो किसी
पत्तियों से भरे पेड़ पर
बसा लिए
ऐसा प्रतीत हुआ
पुराने रिश्ते निभाने आये हैं
मैं समझ गया
पक्षियों को भी पता चल गया
अब पेड़ के  जाने का समय
आ गया है
जाते जाते मिलने की
रस्म पूरी करते रहो
थोड़ी बहत खुशी देते रहो
द्रश्य को देख कर
मुझे ध्यान आया
बुढापा ऐसा ही होता है
बहुत कम संगी साथी
शरीर बीमार,
अपनों की कमी
कभी कोई मिलने आ जाए
तो ह्रदय खुशी से भर जाए
नहीं तो अकेले ठूंठ से
खड़े रहो
समय काटते रहो
संसार से जाने का
इंतज़ार करते रहो
30-05-2012
545-65-05-12

जिसे भी मनायें हम मनायें

जिसे भी मनायें हम मनायें
हमारे दुःख ना जाना कोई
किसे कहें तकलीफ हमारी
हमें सुनने वाला नहीं कोई
हमें तो आदत है सहने की
क्यों हमें दिलासा दे कोई
ना पहले दुआ का असर हुआ
ना अब आगे उम्मीद कोई
अब मुस्काराते हुए जीना है
अब और चारा भी नहीं कोई
30-05-2012
544-64-05-12

समय के साथ

समय के साथ
उम्र बढ़ती
सोच बदलता
रिश्ते बनते बिगड़ते
नए अनुभव
नए अहसास होते
अच्छे बुरे का पता
चलता
नहीं बदलती तो
फितरत नहीं बदलती
बढ़ती उम्र के साथ
अपनी फितरत भी
बदल दो
ज़िन्दगी को कुछ
अच्छे पल दे दो
अनुभव को सार्थक
 कर दो
30-05-2012
543-63-05-12

Tuesday, May 29, 2012

श्रेष्ठ होने का अहम्


आज सूनी पगडंडी भी
मुझ पर हँस रही थी
किनारे लगे पेड़
आश्चर्य से देख रहे थे
पेड़ पर बैठी कोयल भी
क्रोध में
जोर से कूंकने लगी
मानो सब मुझे अहसास
कराना चाहते थे
तुम्हारे बिना मेरा कोई
अस्तित्व नहीं है
भावना हीन
हाड़ मांस के पुतले से
अधिक नहीं हूँ
मात्र पुरुष होने के कारण
तुमसे श्रेष्ठ होने का अहम्
चूर चूर हो गया
मुझे सत्य का पता चल गया
पती पत्नी में ना कोई
श्रेष्ठ होता
ना ही निकृष्ट होता
एक में कमी की पूर्ती
दूसरा करता
अब लौट कर आ जाओ
मुझे प्रायश्चित करने में
सहयोग दो
तुम्हारे बिना वह भी
ठीक से नहीं कर पाऊंगा
29-05-2012
542-62-05-12

Monday, May 28, 2012

चाहत की इन्तहा




हमारी चाहत की
इन्तहा ही कहिये
वो  रकीब से अकेले में
गुफ्तगू करते रहे
कहीं बदनाम ना
हो जाएँ
कोई देख ना ले
दोनों को
फ़िक्र में हम परेशां
होते रहे
उनके घर के बाहर
चहल कदमी करते रहे
28-05-2012
541-61-05-12

हम उन्हें दोस्त समझते रहे



हम उन्हें
दोस्त समझते रहे
वो हमें
दुश्मन मानते रहे
वो ज़ख्म देते रहे
हम खामोशी से
खाते रहे
28-05-2012
540-60-05-12

शौक से




हम ज़ख्मों पर
लगाने के लिए
मलहम की तलाश में
भटक रहे हैं
वो बड़े शौक से
मारने के लिए असले
इकट्ठे कर रहे हैं
अपनी हैवानियत का
सबूत दे रहे हैं
28-05-2012
539-59-05-12

मेरे चेहरे पर झलकता है दर्द जब



मेरे चेहरे पर
झलकता है दर्द जब
उनके चेहरे पर
मुस्काराहट आ जाती
कितनी मोहब्बत हैं
हमसे 
असलियत पता 
चल जाती
28-05-2012
538-58-05-12

शौक-ऐ-मोहब्बत में



हम शौक-ऐ-मोहब्बत में
उनसे गुफ्तगू करते रहे
वो शौक-ऐ-गुफ्तगू में
हमसे गुफ्तगू करते रहे
जब हकीकत पता चली
हम ज़ख़्मी हो कर
आंसू बहाते रहे
वो किसी और से 
गुफ्तगू करते रहे
28-05-2012
537-57-05-12

जब से देखा उनको



जब से देखा उनको
मैंने आइना देखना
छोड़ दिया
उनके सूरत के आगे
अब खुद की सूरत भी
अच्छी नहीं लगती
28-05-2012
536-56-05-12

दिल-ऐ-कातिल



देखा जो
चेहरा उनका करीब से
जान ली हकीकत
छुपी थी जो चमकते
चेहरे के पीछे
दिखा एक
दिल-ऐ-कातिल  मुझे
मासूमियत के पीछे
या तो हकीकत
भूल जाऊँ
उनसे दिल लगाता रहूँ
शौक-ऐ-मोहब्बत में
पेश कर दूं
दिल को
क़त्ल होने के लिए
या उन्हें भूल जाऊँ
बचा लूं जान
दिल के
क़त्ल होने से पहले
28-05-2012
535-55-05-12

बड़ी शिद्दत से वो बोले




हमने माँगा था
निम्बू पानी
उन्होंने शराब का
गिलास दे दिया
हमने कहा
हम पीते नहीं हैं
बड़ी शिद्दत से वो बोले
हमारे खातिर ही पी लो
बाद में हमें
होठों से पिला देना
28-05-2012
534-54-05-12

हमारे ग़मों को आँसूं ना दो


हमारे ग़मों को
आँसूं ना दो
तुम्हारे लिए तो
हँसने का वक़्त है
खुल कर हँस लो
नकाब उठ चुका
तुम्हारे चेहरे से
तुम भी ज़माने
जैसे हो
खुद रुलाने के
हालात पैदा करते हो
फिर मनाने को
कंधा देते हो
28-05-2012
533-53-05-12

जब तक थे साथ हमारे



जब तक 
थे साथ हमारे
कदम नहीं 
बहकते थे उनके
हुए जब से जुदा हमसे
होश नहीं उनको
मदहोश भी इतने
सम्हाले नहीं सम्हलते
गरूर भी इतना
मुंह से नहीं कहेंगे
फिर साथ चाहिए
हमारा
उनकी शर्तों पे
हम आगे बढ़ कर
हाथ भी थाम ले
तो छुडायेंगे भी नहीं
पर कहेंगे ज़रूर
तुम्हें ही ज़रुरत
हमारी
हम तो पहले ही
खुश थे
28-05-2012
532-52-05-12