Thursday, April 28, 2011

अब आँखों को आराम चाहिए


अब आँखों को आराम
चाहिए
खून और बलात्कार की
ख़बरों से राहत चाहिए
घोटाले और भ्रष्टाचार के
किस्सों से मुक्ती चाहिए
दौलत के दिखावे से
धर्म में पनपते धंधे से
भ्रूण ह्त्या के खेल से
नारी पर होते जुर्म से
चरित्र के हनन से
गिरते हुए ज़मीर से
संस्कार,मर्यादा भूलने से 
अब निजात चाहिए
आँखें थक गयीं निरंतर
नरक का मंज़र ज़मीं पर
देखते,देखते
इंसान की हैवानियत
देखते, देखते
 अब आँखों को सुकून 
चाहिए
कुछ बदतर देखूं उससे
पहले,
आँखों को आराम
चाहिए
28-04-2011
770-190-04-11

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