Friday, April 8, 2011

उन्होंने दीवाना समझा मैं परवाना शमा का


उन्होंने
दीवाना समझा
मैं परवाना,शमा का
उसकी रोशनी में होश
खोता
अपना आप खिंचा  
चला जाता
गर्मी-ऐ-हसरत में जलता
रहता
मगर, उफ़ ना करता
खुशी से हर सितम सहता
निरंतर
उनके आगोश में रहना
चाहता
वो बेखबर
माहौल को रोशन
करते,
खुद अँधेरे में जीते
रहते
08-04-2011
626-59-04-11

2 comments:

शिवकुमार ( शिवा) said...

बहुत सुंदर कविता ..

Dr (Miss) Sharad Singh said...

सुन्दर अभिव्यक्ति ....