Monday, January 30, 2012

दिल टूट कर कुछ इस तरह बिखर गया

बेरहमी से
दिल से निकाला गया
उसकी मुस्काराहट  से
भरमाता रहा
निरंतर नए ख्वाब
बुनता रहा
हकीकत से बेफिक्र
उसके नशे में मदहोश
जीता रहा
खुद के लिए मौत का
सामान
इकट्ठा करता रहा
होश आया तो अकेले
खडा था
दिल टूट कर कुछ
इस तरह बिखर गया
सिवाय मौत के
कोई चारा भी ना था  
दफनाने  के लिए
कोई कंधा देने वाला भी  
बचा ना था
30-01-2012
88-88-01-12

2 comments:

Shanti Garg said...

कुछ अनुभूतियाँ इतनी गहन होती है कि उनके लिए शब्द कम ही होते हैं !

induravisinghj said...

दिल होता ही टूटने के लिये है,कितुं पुनः जुड़ता भी है...