222--02-11
अपनों से दूर
परायों के बीच रहता
ना बाहर जा सकता
ना बाहर से कोई आ
सकता
निरंतर अकेले जीवन
बिताता
वहाँ रह रहे हर शख्श से
डरता
दीवार पर लकीरें बनाता
दिन गिनता
कितने दिन रहा,
कितना और रहना
हर दिन हिसाब लगाता
कभी निराशा में
अकेला बैठता
आंसूं बहाता
कभी बेमन से
साथ रहने वालों से बात करता
निरंतर प्रायश्चित करता
नए सपने बुनता
जो किया कभी
फिर ना करने की कसम
खाता
वो जेल में बंद एक कैदी था
अपने कर्मों की सज़ा
पा रहा था
06-02-2011
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