Tuesday, March 29, 2011

जज्बा बदलो

जून का महीना था,
गर्मी से परेशान था
पंखा भी मरता सा
चल रहा था,
कर्र कर्र की आवाज़ से
निस्तब्धता भंग कर
रहा था
थोड़ी थोड़ी देर में रुकता था
मैं हाथ में
दादाजी की बैंत लिए बैठा था
पंखे के रुकते ही,पंखुड़ियों को
बैंत से ठेलता,
पंखा फिर चल पड़ता,
ना सो पाता,ना जाग पाता
मेरे एक मित्र का आना हुआ
आते ही उसने हाथ में
बैंत रखने का कारण पूछा
उसे सारा वाकया बताया
वो जोर से हंसा और बोला
निरंतर सुस्ती छोडो,
जज्बा बदलो
नहीं तो गर्मी झेलते रहोगे
पंखे को
बैंत से ठेलना बंद करो
कल का काम आज करो
उठो पंखा ठीक कराओ
कर्र कर्र से मुक्ती पाओ
ठंडी हवा खाओ
29-03-03
537—207-03-11
  (जज्बा =Attitude= रवैया)

No comments: