Saturday, March 19, 2011

अपने को इक्कीसवीं सदी का ,सभ्य और पडा लिखा इन्सान कहते





करीब चालीस वर्ष बाद
मेरे पैदाइश के शहर में पहुंचा
मन वहाँ जाने के नाम से ही
रोमांच से भरा था
कहाँ कहाँ जाऊंगा,
किस किस से मिलूंगा
किस मशहूर दूकान पर
क्या खाना,सब मन में तय था
होटल से पहले ऑटो  वाले को
मेरे पुराने मोहल्ले चलने को कहा
जहां बचपन से कॉलेज तक
समय व्यतीत किया
नज़ारा बदला हुआ था
नए नए बंगलों से इलाका
भरा हुआ था
अंदाज़ से
पुराने घर के पास पहुंचा
एक सज्जन से मथुरा वाले
शर्माजी के घर का पता पूंछा
उन्होंने बिना बोले ही ना में
गर्दन हिलायी,
हाथ से आगे बढ़ने का
इशारा किया,
अगले घर में रहने वाले ने
उन्हें नहीं पता ,कह कर
कुछ और पूंछूं,उस से पहले ही
अन्दर का रास्ता लिया
दो तीन घर आगे
एक बंगले में गेट खोल
अन्दर घुसा ही था
एक साहब ने चिडचिडे
भाव से पूंछा
अन्दर क्यों आ रहे हो
बाहर से काम बताओ
अच्छा नहीं लगा
फिर भी वही सवाल
उनसे भी पूंछा
क्रोध में बोले
डोंट वेस्ट माई टाइम
कहीं और पूँछों
मैं गेट के बाहर निकला,
याद करने लगा
दादाजी बाहर बरामदे में बैठते थे
बीमार थे,दिन भर खांसते थे
हर आने जाने वाले से
राम श्याम करते थे
कोई भूले से अन्दर आ जाए
चाय पानी पूंछते थे
दो बात इधर उधर की भी करते थे
जाते समय फिर आना कहते थे
दादाजी की उम्र के लोग चले गए
साथ ही अनजान से भी प्यार से
बोलने की कला और अपनापन
भी ले गए
अपने पीछे थके,चिढचढ़े
चेहरे छोड़ गए
जो निरंतर अनजान इंसान से
किसी और गृह के प्राणी सा
व्यवहार करते
अपने को इक्कीसवीं सदी का
सभ्य और पडा लिखा 
इन्सान कहते
19-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
453—123-03-11

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