Monday, March 28, 2011

पुष्प की व्यथा



पौधे को
बड़े चाव से रोपा
प्यार से सींचा
स्नेह से पाला
यौवन पर पहुंचा
एक कली को
जन्म दिया
कली,पुष्प बनी
महक से अभीभूत किया
रूप-रंग से मोहित किया
निर्ममता से तोड़ा गया
पालनहार,भक्षक बना
यम का रूप दिखाया
मंदिर,मज़ार पर
चढ़ाया गया
गले का हार बना
दुःख,सुख के मौके पर
उपयोग हुआ
मंतव्य संपन्न हुआ
यूँ ही फैंका गया
कुचला गया
वो रोता रहा
जग हंसता रहा
निरंतर, पुष्प के साथ
ऐसा व्यवहार होता रहा
पुष्प की व्यथा पर
ध्यान किसी ने ना
दिया
वो सदियों से सब
सह रहा
अब भी जगत को
मोह रहा
28-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
525—195-03-11

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