Monday, March 28, 2011

रो रो कर ,हाल-ऐ-दिल क्यूं बताता रहूँ?


रो रो कर क्यूं
 हाल-ऐ-दिल बताता रहूँ ?
ग़मों का
बाज़ार लगाता रहूँ
मन ही मन रोता हूँ 
ज़ख्मों को खुद सिलता हूँ
बोझ हल्का करने की
कोशिश करता हूँ
हंस कर ग़मों को पियूं
ज़माने को बर्दाश्त नहीं
यकीन मुझ पर करते नहीं  
समझते, सख्त जान,
तंग दिल हूँ
कहाँ पता किसी को,
अन्दर से नर्म हूँ
नाज़ुक दिल का मालिक हूँ
अन्दर ही अन्दर व्यथित हूँ
गम लोगों के बढ़ाना
नहीं चाहता
रो रो कर याद लोगों को
उनके ग़मों की
दिलाना नहीं चाहता
निरंतर चुपचाप रहता हूँ
ग़मों को खुद ही पीता हूँ
खुदा देख रहा
सच को जान रहा
सिर्फ वो ही काफी है
28-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
526—196-03-11

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