अब वो
कटे कटे से रहते
देख कर मुंह छुपाते
नज़र ना पड़े
कोशिश पूरी करते
ना जाने
किस ख्याल में जीते
ना पैगाम भेजते
ना पैगाम का जवाब देते
निरंतर दूरी बनाए रखते
इबादतखाने को मयखाना
समझते
बिना पिए ही बहकते
हंस कर बोलने को इश्क
कहते
दिल की बात करने पर
बीमार-ऐ-इश्क का
खिताब देते
07—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
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