Tuesday, March 8, 2011

कविता लिखते काफी अरसा हो गया




काफी अरसा हो गया 
अपने को बड़ा भारी कवी
समझने लगा
गलतफहमी में जीने लगा
भावनाओं का पंडित हूँ
बताने का मौक़ा
खोजने लगा
किसी पत्रिका में
कविताओं के छपने का
रास्ता ढूँढने लगा 
तभी एक पुराने कवी से
मुलाक़ात हुई
मनोइच्छा उनको बतायी
उन्होंने फ़ौरन राह दिखायी
पहले कुछ शर्तें लगायी
उन्हें गुरु मानना होगा
उनकी कविताओं की तारीफ़ में
कुछ लिखना होगा
समझ नहीं आये फिर भी
"बहुत खूब"कहना होगा"
मेरी कविताओं को 
समझने में जोर लगाना पड़े ,
सम कालीन कविता लगे
इसलिए गूढ़ शब्दों का 
समावेश करना होगा
शब्दों का जाल बुनना होगा 
मैंने एक कान से सुना
दूसरे से निकाला
उलटे पैर लौट चला
निरंतर जैसे लिखता था
 आज फिर वैसे ही
लिख डाला
08—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

(समकालीन कवियों,
उनकी कविताओं को नहीं समझने की ध्रष्टता के लिए ह्रदय
से क्षमा याचना)

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