Monday, March 7, 2011

शाम होती,बगीचे की बैंच मेरा इंतज़ार करती


शाम होती
बगीचे की बैंच मेरा
इंतज़ार करती
निरंतर एक ही बात सोचती
मैं आऊँगा,बैठूंगा,बेचैनी से
घड़ी देखूंगा
कोई पत्रिका या अखबार
हाथ में होगा
फिर अखबार पढने की
कोशिश करूंगा
कुछ पल बाद उसे
समेटूंगा,
फिर खडा हो कर
चहलकदमी करूंगा
किसी पेड़ से पत्ता तोडूंगा
ऊंगलियों से उस से खेलूंगा
आशा से नज़रें बार बार
बगीचे के दरवाज़े पर
गडाऊंगा
किसी के आने का इंतज़ार
करूंगा
नहीं दिखने पर फिर
बैंच पर आ बैठूंगा ,
कभी सर पर हाथ फिराऊंगा
कभी हल्की सी जम्हाई लूंगा
जूते उतार कर फिर अखबार
खोलूंगा
पढने की कोशिश करूंगा
हर आहट पर दरवाज़े को
देखूंगा
 कुछ  क्षण बाद फिर
उठूंगा,घड़ी देखूंगा
चेहरे पर
बेचैनी और निराशा के
भाव प्रकट होने लगेंगे
सांयकाल में रात का
दखल होगा
दिखना भी कम होगा
बगीचे के चौकीदार की
आवाज़ आएगी
जाने का वक़्त हो गया
हाथ पर बंधी घड़ी को
इशारे से दिखाएगा
मैं फिर उठूंगा
धीरे धीरे बाहर की और
बढूंगा
कल शाम को फिर
लौटूंगा
बैंच फिर इंतज़ार
करती मिलेगी
उसके आने की आस
नहीं मिटेगी
07—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

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