Saturday, March 5, 2011

कहाँ तो सोचा था,एक आशियाना बनाऊंगा


  
कहाँ तो सोचा था
एक आशियाना बनाऊंगा
दुनिया अपनी उस में बसाऊंगा
हँसते ,गाते ज़िन्दगी जिऊंगा
वक़्त ने बदला ये कैसा लिया
सब कुछ मेरा लूट लिया
हंसने की चाह में रोना मिला
ज़िन्दगी अब क्या ख़ाक जीऊँगा?
क्या निरंतर मर मर कर जिऊंगा?
घर तो मेरा लुट गया
क्या मौत भी लुट जाएगी
आते आते
क्या अश्क भी सुखाएगी?
दिल तो टूटा मेरा
क्या मौत भी सताएगी?
05—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर



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