पत्थर हूँ
तो क्या हुआ
मुझ में भी दिल बसता
पहाड़ों से ज़मीन तक
रहता
मज़ार से मंदिर तक काम
आता
घर सड़क में इस्तेमाल होता
इंसान का बुत मुझ से बनता
इश्वर समझ पूजा जाता
आभूषण में सौन्दर्य बढाता
कभी नीलम कभी पुखराज
कहलाता
इतना कर के भी दुत्कारा
जाता
मूर्ख को अक्ल में पत्थर
कह कर
निष्ठुर दिल को पत्थर दिल
कह कर
निरंतर मज़ाक बनाया जाता
मुझ से ज्यादा इंसान निष्ठुर
हथोड़े निरंतर चलाता मुझ पर
फिर भी कुछ नहीं कहता
हर चोट को चुपचाप सहता
निरंतर काम इंसान के आता
एक प्रार्थना मैं भी कर लूं
थोड़ा सम्मान मुझे भी दे दो
भावनाओं का ख्याल कर लो
मुहावरों से मेरा नाम
हटा दो
06—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
5 comments:
Dinesh pareek ने आपकी पोस्ट " सिद्धांत से जीने वाले को,लोह पुरुष कहते " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:
बहुत सुन्दर | आपकी हर पोस्ट पढ़ कर बहुत अच्छा लगा |
Roshi ने आपकी पोस्ट " पत्थर हूँ तो क्या हुआ,मुझ में भी दिल बसता " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:
wah bahut hi sunder likha hai
saurabh dubey ने कहा…
पत्थर में भी एक दिल होता हें पर इसे अनुभव करने के लिये एक दिल चाहिए
ब्लॉगर हरीश सिंह ने कहा…
तभी तो कहते है जनाब, दिल पत्थर हो गया, दिल पत्थर ही है क्योंकि टूट जाता है.
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६ मार्च २०११ ११:४४ अपराह्न
Dear Dr Tela sb,
whenever I get time I always try to read all your nicely crafted Poems.
Today I read " Main Kaun Honn"( Who Am I ? ) and " Pathar Ki Vyatha'( Pains of a Stone )
Really wonderful !! Real Original Thoughts.
Poem Compels you to think about our own behavior.
May God Bless You Good Health With Inovative Thought Process.
Regards.
VK.Singhvi
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