वो फूल
सम्हाल कर रखा
जो उसने मुझे
जन्म दिन पर दिया
भले ही सूख गया
फिर भी
दोहरी खुशबू से महकता
इक उसके हाथों की,
इक फूल की
रंग अब भी सुर्ख लाल
वक़्त की मार से हल्का
ना हुआ
निरंतर उसे देख बीते
वक़्त में लौटता
खुशबू से अहसास
उसके पास होने का होता
ख्याल टूटने पर
निरंतर रश्क
उस किताब से होता
खुद से ज्यादा
खुद से ज्यादा
किताब को ज्यादा
खुश किस्मत समझता
जिस के आगोश में फूल
हर वक़्त रहता
06—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
No comments:
Post a Comment