387—57-03-11
जो बीत गया,
क्यूं उसे याद रखूँ?
कब तक बोझ उसका ढोऊं
पहले ही गम
क्या कम ज़िन्दगी में
क्यूं और
इजाफा उन में करूँ?
क्यूं रोज़ रोता रहूँ ?
क्यूं ना
अब निरंतर हंसूं ?
लोगों को हंसाया करूँ
हर दिन
नए जज्बे से जिऊँ?
सब को
जीना सिखाया करूँ
08—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
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