Wednesday, March 9, 2011

दिल तोड़ कर भी,शिकन चेहरे पर नहीं


 

394—64-03-11

ना हिल डुल सकता
ना उठ बैठ सकता
नित्य कर्म भी पलंग पर होता
अस्पताल की छटी मंजिल पर
ज़िंदा लाश सा
बिस्तर पर लेटा रहता
सख्त बीमार था, 
कमरे में अकेला था
  कभी पंखे को, 
कभी खिड़की को देखता
निरंतर खुद से
मन की बात कहता
कभी खिड़की के बाहर देखूं
जो बाहर हो रहा उसका आनंद लूं
शाम को डाक्टर से
पलंग खिड़की के पास
लगवाने की गुजारिश करूंगा
क्या पता था इच्छा अपूर्ण रहेगी
दोपहर में किसी और मरीज की
खाट खिड़की के पास लगेगी
मन में नए साथी के प्रति
नफरत पैदा हो गयी
नया साथी दिन भर
खांसता रहता
थोडा दम आता तो,
 खिड़की के बाहर देखता
रंग बिरंगे पक्षियों, 
मैदान में खेल रहे बच्चों
कौन आ रहा , 
कौन जा रहा बताता रहता
अब थोड़ी तसल्ली थी
उस के प्रती तल्खी भी कम थी
कम से कम
बाहर क्या हो रहा था
कुछ पता तो पड़ता था
दिन बीतते गए, 
बीमारी ठीक होने लगी
एकांत की भयानक त्रासदी
कम होने लगी
एक दिन सुबह देर से
उठा तो देखा
सामने का पलंग खाली था, 
साथी अब वहाँ ना था
सोचा शायद छुट्टी पा गया, 
अपने घर चला गया
बिना बताये जाने पर बड़ा
क्रोध आया
बाद में पता चला, 
फेफड़े के कैंसर से पीड़ित था
रात मैं उसने दम तोड़ दिया, 
मन में दुःख तो हुआ
पर आज फिर मौक़ा मिला
डाक्टर के आने पर
मन की इच्छा बताएगा
अपना पलंग खिड़की के पास
लगवाएगा
डाक्टर आया,उसकी गुजारिश
मान गया
पलंग खिड़की के पास लगते ही
उसने बाहर झांका
सिवाय एक दीवार के
कुछ नज़र ना आया
आज माजरा समझ गया
बिछड़ा साथी खुद मौत के
कगार पर खडा था
उसे खुश रखने के लिए
कहानियां गढ़ता था
मरते मरते भी इंसानी कर्तव्य
से विमुख ना था
शर्म से उसका सर झुक गया
ग्लानी में अश्रुओं का
बहना शुरू हो गया
09—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर






डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

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