Monday, March 7, 2011

वो रंग बिरंगी नन्ही सी चिड़िया,रोज़ मेरे घर में आती



वो रंग बिरंगी
नन्ही सी चिड़िया
रोज़ मेरे घर में आती
बागीचे की मुंडेर पर बैठती
चहचाहट से ध्यान आकर्षित
करती
चोंच में कभी तिनका
कभी धागा साथ लाती
इधर उधर उधर देखती
शशंकित सी
धीरे धीरे बागीचे के कोने में
लगी बेल में जा छुपती
निरंतर होशियारी से घोंसला
अपना बनाती
थोड़ी देर में चौकन्नी बाहर आती
इधर उधर नज़रें घुमाती
फुर्र से उड़ जाती
कुछ समय बाद फिर लौटती
तन्मयता से वही कहानी
दोहराती 
खुद का आशियाना बसाने की
उम्मीद में
निरंतर शिद्दत से लगी रहती  
उसे कहाँ पता
मनुष्य की घाघ नज़रों से
नहीं बच सकेगी
इक दिन नज़र पड़ने पर उसकी
उम्मीद टूटेगी
घोंसले की जगह खाली होगी
किसी को पनपते नहीं देखने की
इंसानी फितरत जारी
रहेगी
07—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

5 comments:

Dinesh pareek said...

Dinesh pareek ने आपकी पोस्ट " वो रंग बिरंगी नन्ही सी चिड़िया,रोज़ मेरे घर में आती... " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

बहुत ही सुन्दर और रोचक लगी

हरीश सिंह said...

हरीश सिंह ने कहा…

ब्लॉगर हरीश सिंह ने कहा…

धीरे धीरे बागीचे के कोने में
लगी बेल में जा छुपती
---------------------------
सुन्दर अभिव्यक्ति, अच्छी कविता.

७ मार्च २०११ ११:४६ पूर्वाह्न
७ मार्च २०११ १२:३३ अपराह्न
saty bolna paap hai ने कहा…

saty bolna paap hai ने कहा…

क्या खूब कही चिड़िया की कहानी, सुन्दर रचना आभार.

७ मार्च २०११ ११:५१ पूर्वाह्न
७ मार्च २०११ १२:३५ अपराह्न

मंगल यादव said...

मंगल यादव ने कहा…

बहुत खूब

७ मार्च २०११ ५:४४ अपराह्न

rubi sinha said...

rubi sinha ने कहा…


सुन्दर रचना आभार.

७ मार्च २०११ ६:३९ अपराह्न

Dr.sandeep Awasthi(Leo Original) said...

leo original
to me

show details 9:37 PM (3 minutes ago)

woh rang birangi chida....main aapne bimbo,means symbols,ke madhayam se sarvhara ke taqleaf ko jo express kia hai,usne kavita ke ant main ek universal appeal create kar de hai. keep it up. bahut jald aap nae roop main samane aane wale hai... meri kavitae padi..dekhe jara