किताब
आज मेज पर पडी थी
धूल से अटी थी
कोई उठाये और पढ़े
इंतज़ार में रहती थी
प्रकाशित हुई
तब कौतुहल का विषय थी
चायखाने से मयखाने तक
उस पर चर्चा होती
हर पत्रिका में उसकी
समीक्षा छपती
जो भी पढता गर्व से
बताता
अपने को सबसे बड़ा
साहित्य प्रेमी समझता
समय के अंतराल में
लोग उसे भूलते गए
उठा कर अलमारी में
सजाते गए
आज नाम भी कोई
नहीं लेता
जो कभी अर्श पर थी
आज फर्श पर है
समय के चक्र के साथ
अब इतिहास है
किताब को पता ना था
ऊंचाई से गिरने में
कितना कष्ट होता है
निरंतर चमकने वाला भी
कभी धूल खाता है
07—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
1 comment:
Roshi ने आपकी पोस्ट " निरंतर चमकने वाला भी कभी धूल खाता है " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:
sabhi rachnayein padkar bahut accha laga
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