Monday, March 7, 2011

निरंतर अकड़ मैं रहने वाला,आज ज़मीन पर पसर गया


373—43-03-11
वो बड़े अफसर थे
कुर्सी और ओहदे की
अकड़ में रहते थे
मातहतों से गुलामों सा
व्यवहार करते 
निकृष्ट निकम्मा कहने में
देर ना लगाते
जनता से सीधे मुंह बात
न करते
हर बात में ओहदे की
धोंस देते
एक दिन अफसर से भी
बड़े अफसर आए
आते ही वो भी गुर्राए
स्वागत में कमी का
उल्हाना दिया
कार्यों की समीक्षा करी
तो क्रोध से मुंह लाल 
हो गया
फौरन ही उन्हें भी
भ्रष्ट और नाकारा
करार दिया
अफसर जी मुंह लटकाए
खड़े रहे
मातहतों के सामने
ज़लील होते रहे 
खुद की बीमारी का इलाज
खुद की दवा से करवाते रहे
निरंतर अकड़ मैं रहने वाला
आज ज़मीन पर पसर गया
ऊँट आज पहाड़ के नीचे
आ गया   
जैसे को तैसा का अर्थ
समझ गया
07—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

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