Monday, March 7, 2011

निरंतर चमकने वाला भी कभी धूल खाता है

किताब
आज मेज पर पडी थी
धूल से अटी थी
कोई उठाये और पढ़े
इंतज़ार में रहती थी
प्रकाशित हुई
तब कौतुहल का विषय थी
चायखाने से मयखाने तक
उस पर चर्चा होती
हर पत्रिका में उसकी
समीक्षा छपती
जो भी पढता गर्व से
बताता
अपने को सबसे बड़ा
साहित्य प्रेमी समझता
समय के अंतराल में
लोग उसे भूलते गए
उठा कर अलमारी में
सजाते गए
आज नाम भी कोई
नहीं लेता
जो कभी अर्श पर थी
आज फर्श पर है
समय के चक्र के साथ
अब  इतिहास है
किताब को पता ना था
ऊंचाई से गिरने में
कितना कष्ट होता है
निरंतर चमकने वाला भी
कभी धूल खाता है
07—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

1 comment:

Roshi said...

Roshi ने आपकी पोस्ट " निरंतर चमकने वाला भी कभी धूल खाता है " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

sabhi rachnayein padkar bahut accha laga