एक और
दिन गुजर गया
चेहरा दिन भर आँखों में रहा
पैगाम का इंतज़ार होता रहा
निरंतर प्यासा, प्यासा रहा
फिर भी गिला उनसे नहीं
शायद उन्हें वक़्त मिला नहीं
आरज़ू अभी मरीनहीं
उम्मीद अभी टूटी नहीं
रात किसी तरह गुजर
जाएगी
फिर नयी सुबह आएगी
कल पैगाम जरूर आएगा
इंतज़ार ख़त्म हो
जाएगा
09—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
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