Monday, March 7, 2011

कभी हरा भरा था,पत्तियों से भरा था


380—50-03-11


कभी हरा भरा था,
पत्तियों से भरा था
आज अकेला ठूंठ सा खडा
बिना कपड़ों के शरीर का
कंकाल दिखता 
पतझड़ के मौसम में पत्ते
पीले पड़ते गए 
एक एक कर नीचे
गिरते गए
अब तक समझता था
पत्तों का अस्तित्व
उसके कारण था
आज समझ में आ रहा
बिना पत्तों के असुर सा
लगता
ना कोई छाया में नीचे
बैठता
ना कोई पक्षी नीड़
बनाता
अछूत सा हो गया
सह अस्तिव्त्व का महत्त्व
समझ गया
अब निरंतर बसंत के
आगमन की प्रक्तीक्षा
करता
फिर से हरा भरा होने के
सपने देखता
07—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

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