तेरी
महफ़िल से क्या निकले
खानाबदोश हो गए
दिल तो टूटा,अरमान भी
टूट गए
आशियाना मेरा छूटा,
उस का रास्ता भी भूल गए
कदम खुद-ब-खुद बढ़ते थे जिधर
नज़रें भी अब उठती नहीं उधर
हर शख्श हालत पर हंस रहा
अंजाम-ऐ-इश्क सब को दिख रहा
जीना मुश्किल हुआ,
चैन भी खो गया
दिल अब ग़मों का घर हुआ
निरंतर आ रहे
ख्यालों से जहन भर गया
सुर हर साज़ का बिखर गया
संगीत ज़िन्दगी का
बेसुरा हुआ
05—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
No comments:
Post a Comment