Sunday, March 6, 2011

सड़क अब सूखी नदी सी लगती,बिन पानी अर्थहीन दिखती



निरंतर
इस सड़क से गुजरता था
आज फिर निकला हूँ
वही सड़क वही मकान
वही पेड़ 
वही पक्षियों की चहचाहट
आज अच्छी  हीं लग रही
आँखों में हर चीज़ चुभ रही
काटने को दौड़ रही
नज़र कहीं भी नहीं ठहरती
इक टीस मन में उठती
आवाज़ कानों में उसकी
गूंज रही 
हर चीज़ स्पंदनहीन
दिख रही
हर बीती बात याद
आ रही
पर उसकी मुस्कान भरी
सूरत नज़र नहीं आ रही
अब वो यहाँ नहीं रहती
किसी और दुनिया में
चली गयी
सड़क को रीता कर गयी
कईयों
को रोता छोड़ गयी
सड़क अब सूखी नदी
सी लगती
बिन पानी अर्थहीन
दिखती
06—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

2 comments:

Dinesh pareek said...

Dinesh pareek ने आपकी पोस्ट " सिद्धांत से जीने वाले को,लोह पुरुष कहते " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

बहुत सुन्दर | आपकी हर पोस्ट पढ़ कर बहुत अच्छा लगा |
आप मेरे ब्लॉग पे भी आइये आपको अपने पसंद की कुछ रचनाये मिलेंगी
दिनेश पारीक
http://vangaydinesh.blogspot.com/

Roshi said...

Roshi ने आपकी पोस्ट " 367—37-03-11 सड़क अब सूखी नदी सी लगती,बिन पानी अर... " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

bahut pyari rachna lagi aapki